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केरल के मुख्यमंत्री ने पोप फ्रांसिस के निधन पर किया शोक व्यक्त

तिरुवनंतपुरम, 21 अप्रैल (वार्ता) केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने पोप फ्रांसिस के निधन पर शोक व्यक्त किया। पोप का सोमवार को कासा सांता मार्टा स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे।
मुख्यमंत्री ने एक संदेश में कहा, ''पोप फ्रांसिस अपने पीछे करुणा, समावेशिता और सामाजिक न्याय के प्रति गहरी प्रतिबद्धता की विरासत छोड़ गए हैं।''
उनके कार्यकाल की विशेषता हाशिए पर पड़े समुदायों के साथ उनका लगाव, अंतरधार्मिक संवाद और वैश्विक पूंजीवाद के बारे में उनकी आलोचनात्मक टिपण्णियों के लिये जानी जायेगी।
पोप फ्रांसिस गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अक्सर चर्च के मिशन पर जोर दिया कि समाज द्वारा छोड़े गए लोगों की सेवा की जाए, जिसमें बेघर और गरीब आबादी भी शामिल है।
ब्यूनस आयर्स में उनके अनुभवों ने गरीबी के बारे में उनकी समझ को आकार दिया जिससे उन्हें यह घोषणा करने के लिए प्रेरित किया कि उदासीनता के वैश्वीकरण का मुकाबला जरूरतमंदों के लिए सक्रिय करुणा से किया जाना चाहिए।
समलैंगिक अधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उनके पोप कार्यकाल के दौरान विकसित हुई, क्योंकि उन्होंने एक अधिक समावेशी चर्च को बढ़ावा देने की कोशिश की। उन्होंने कहा था कि हर किसी की गरिमा होती है, चाहे उनका यौन रुझान कुछ भी हो।

पोप फ्रांसिस ने फिलिस्तीनियों के अधिकारों की भी वकालत की, अक्सर उनकी दुर्दशा के साथ एकजुटता व्यक्त की। उन्होंने वहां के लोगों की पीड़ा को उजागर किया। क्षेत्र में शांति और आपसी समझ की वकालत की। उनके अंतर-धार्मिक प्रयासों में विभिन्न धर्मों के नेताओं के साथ ऐतिहासिक बैठकें शामिल थीं, जिससे उनका यह विश्वास मजबूत हुआ कि शांति के लिए संवाद आवश्यक है।
अपने पूरे कार्यकाल के दौरान पोप फ्रांसिस ने शांति को बढ़ावा देने के साधन के रूप में अंतर-धार्मिक संवाद को प्राथमिकता दी। उनका मानना ​​था कि वैश्विक संघर्षों को संबोधित करने और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न धर्मों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण है।
इस्लाम, यहूदी धर्म और अन्य धर्मों के नेताओं के साथ उनकी मुलाकातें समुदायों के बीच पुल बनाने की उनकी प्रतिबद्धता का उदाहरण थीं। संयुक्त अरब अमीरात और इराक की उनकी यात्राएं तथा उनके संबंध में जारी किए गए बयान ऐतिहासिक थे।
उन्होंने अक्सर गरीबी, पर्यावरण क्षरण और जलवायु परिवर्तन जैसे दबावपूर्ण वैश्विक मुद्दों से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास का आह्वान किया और इस बात पर जोर देते हुए कि ये चिंताएं धार्मिक सीमाओं से परे हैं।
पोप फ्रांसिस पूंजीवाद की अपनी आलोचना में अडिग थे, जिसे वे एक ऐसी प्रणाली के रूप में देखते थे जो असमानता को कायम रखती है और गरीबों को हाशिए पर रखती है।उनके विश्वपत्रों में अक्सर आर्थिक प्रणालियों में संरचनात्मक
परिवर्तनों की आवश्यकता को संबोधित किया जाता था, ताकि अधिक समतापूर्ण समाज का निर्माण किया जा सके।
पोप फ्रांसिस की विरासत गहन सहानुभूति और अधिक न्यायपूर्ण विश्व के निर्माण की दिशा में कार्रवाई की है।
श्री विजयन ने कहा कि विविध समुदायों तक उनकी पहुंच, अंतरधार्मिक संवाद के प्रति प्रतिबद्धता और पूंजीवाद की आलोचना भविष्य की पीढ़ियों को शांति और सामाजिक न्याय की खोज में प्रेरित करती रहेगी।
समीक्षा, सोनिया
वार्ता
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