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श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में 14 जनवरी को भव्य लक्षदीपम का आयोजन

तिरुवनंतपुरम, 12 जनवरी (वार्ता) भगवान श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में आयोजित होने वाला सबसे प्राचीन एवं आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक मुराजपम अनुष्ठान 14 जनवरी को भव्य लक्षदीपम के साथ समाप्त होगा जो 56 दिनों तक चलने वाले वैदिक मंत्रोच्चार समारोह के संपन्न होने का प्रतीक है।
त्रावणकोर शाही परिवार के सदस्य आदित्य वर्मा ने यूनीवार्ता से कहा कि लक्षदीपम एक पवित्र अनुष्ठान है जिसके दौरान एक लाख पारंपरिक तेल के दीपक एक साथ जलाए जाते हैं जिससे ऐतिहासिक मंदिर एवं उसके आसपास का क्षेत्र प्रकाश एवं भक्ति में सराबोर हो जाता है।
मुराजपम प्रत छह वर्षों में एक बार आयोजित होता है। इस बार यह 20 नवंबर, 2025 को शुरू हुआ और इसका अत्यधिक धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व है। समापन समारोह के भाग के रूप में, मरकज़ी कलाभम पहले ही शुरू हो चुका है और 14 जनवरी तक चलेगा। इससे पहले, 27 दिसंबर से सात जनवरी तक 12 दिवसीय कलाभभिषेकम आयोजित किया गया।
मंदिर प्रशासन ने 13 जनवरी को लक्षदीपम के पूर्व परीक्षण का कार्यक्रम निर्धारित किया है जबकि श्रद्धालु इस ऐतिहासिक आयोजन को देखने के लिए 14 जनवरी को शाम पांच बजे से मंदिर परिसर में प्रवेश कर सकेंगे। लक्षदीपम प्रज्वलित होने के बाद, रात 8.30 बजे से श्रीवेली, दीपाराधना और मकरसेवली अनुष्ठान संपन्न होंगे।
सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, श्री पद्मनाभस्वामी, श्री नरसिम्हास्वामी और श्री कृष्णस्वामी की मूर्तियों को गरुड़ वाहन पर एक औपचारिक जुलूस के साथ निकाला जाएगा जिसका नेतृत्व त्रावणकोर शाही परिवार के मुखिया करेंगे।
श्रद्धालुओं को बिना किसी परेशानी के अनुष्ठानों का दर्शन सुनिश्चित की व्यवस्था की गई है। मंदिर के बाहर एलईडी स्क्रीन लगाई जाएंगी जिन पर अनुष्ठानों का सीधा प्रसारण किया जाएगा। 15 और 16 जनवरी को भी दीपालंकराम दर्शन उपलब्ध होंगे। श्रद्धालुओं के आवगमन को नियंत्रित करने एवं सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुल 15,000 बारकोड वाले पास जारी किए जाएंगे।
लक्षदीपम अनुष्ठान की शुरुआत सन् 1750 में त्रावणकोर के शासक अनीयम तिरुनाल मार्तण्ड वर्मा के शासनकाल में हुई थी। पहले मुराजपम अनुष्ठानों में ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का पाठ शामिल होता था जबकि इस वर्ष के अनुष्ठान में अथर्ववेद का पाठ भी शामिल किया गया है।
प्रतिदिन सुबह वैदिक मंत्रोच्चार और सहस्रनाम पाठ किया जाता है जबकि शाम को मंदिर परिसर में स्थित पद्मतीर्थम तालाब में जल जपम किया जाता है। ऐतिहासिक मुराजपम समापन दिवस पर लक्षदीपम प्रज्वलित होने के साथ अपने भव्य आध्यात्मिक चरम पर पहुंचता है जो अंधकार पर प्रकाश की विजय और पवित्र वैदिक प्रार्थनाओं के संपन्न होने का प्रतीक है।
जैसे ही शाम ढलती है मंदिर के गलियारों, बाहरी दीवारों, रास्तों और आस-पास की सड़कों पर एक लाख तेल के दीपक एक साथ जलाए जाते हैं, जो एक लुभावना दृश्य प्रस्तुत करते हैं जो केरल और देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों भक्तों को आकर्षित करता है।
अंतिम दिन की शुरुआत तड़के विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठानों से होती है, जिनका संचालन मुख्य पुजारी और मंदिर के पुजारी सदियों पुरानी परंपराओं एवं रीति-रिवाजों का कड़ाई से पालन करते हुए करते हैं। इसके बाद वैदिक मंत्रों का समापन होता है जो देश के विभिन्न क्षेत्रों के प्रख्यात वैदिक विद्वानों द्वारा लगातार सात चक्रों में संपन्न किए जाते हैं।
वेदों, विष्णु सहस्रनाम और संबंधित भजनों की गूंज पूरे मंदिर परिसर में सुनाई देती है जिससे वातारवरण आध्यात्मिक एवं भक्तिमय हो जाता है। समापन दिवस के प्रमुख आकर्षणों में से एक मुरासीवेली है जो अंतिम भजन-कीर्तन के समापन के बाद निकाली जाने वाली औपचारिक शोभायात्रा है।
शोभायात्रा के दौरान, मंदिर के देवताओं को पारंपरिक सीवेलिप्पुरा (घोड़े का रथ) पर ले जाया जाता है, जिसमें नादस्वरम, ताल वाद्य यंत्र और वैदिक मंत्रों का जाप होता है और भक्त इस पवित्र दृश्य को श्रद्धापूर्वक देखने के लिए खड़े रहते हैं।
यह शोभायात्रा सार्वभौमिक शांति, समृद्धि और कल्याण के लिए मुराजपम के दौरान की गई प्रार्थनाओं की दैवीय स्वीकृति का प्रतीक है। संध्या होने के साथ ही मंदिर में बहुप्रतीक्षित लक्षदीपम का आयोजन होता है जिसे दक्षिण भारत के सबसे भव्य और आध्यात्मिक आयोजनों में से एक माना जाता है।
जब एक साथ दीपक जलाए जाते हैं तो गर्भगृह और आसपास का क्षेत्र रोशनी से जगमगा उठता है जिससे भक्तों को अनंत आसन पर लेटे हुए भगवान श्री पद्मनाभ के अद्भुत दर्शन प्राप्त होते हैं। ऐसा माना जाता है कि लक्षदीपम दर्शन से अपार आध्यात्मिक पुण्य एवं दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होता है।
मंदिर के अधिकारियों ने कहा कि समापन दिवस पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को संभालने के लिए विस्तृत व्यवस्था की गई है। भीड़ नियंत्रण के विशेष उपाय, सुरक्षा व्यवस्था में वृद्धि और सुगम दर्शन के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराई गई है।
पुलिस कर्मियों और स्वयंसेवकों ने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया है कि सभी अनुष्ठान एवं समारोह शांतिपूर्ण तरीके से और बिना किसी बाधा के संपन्न हों।
त्रावणकोर के महाराजा अनीयम तिरुनाल मार्तण्ड वर्मा द्वारा स्थापित मुराजपम का ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्व है और यह त्रावणकोर शासकों की अपने राज्य को भगवान पद्मनाभ के चरणों में समर्पित करने और पद्मनाभ दास के रूप में शासन करने की अनूठी परंपरा को दर्शाता है।
इस अनुष्ठान के सफल समापन से एक बार फिर श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की वैदिक विरासत और भक्ति प्रथाओं के जीवंत केंद्र के रूप में प्रतिष्ठा की पुष्टि होती है।
जैसे-जैसे रात ढलने के साथ तेल के दीयों की चमक कम होती जाती है भक्त हाथ जोड़कर धीरे-धीरे विदा होने लगते हैं, अपने साथ मुराजपम के आध्यात्मिक अनुभव एवं उसके उज्ज्वल समापन को साथ लेकर जाते हैं और छह वर्षों बाद होने वाले इसके अगले आयोजन की प्रतीक्षा करते हैं।
अभय, मधुकांत
वार्ता
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