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वैश्विक उर्वरक संकट के बीच आईसीएआर-सीआईबीए का मछली के कचरे से बना जैव-उर्वरक दे रहा है टिकाऊ विकल्प

चेन्नई, 06 जून (वार्ता) तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई स्थित केंद्रीय खारा जलजीव पालन अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीआईबीए) ने मछली के कचरे से जैव-उर्वरक बनाने की नयी तकनीक विकसित की है। वैश्विक उर्वरक संकट के बीच यह तकनीक पारंपरिक खादों का एक टिकाऊ और फायदेमंद विकल्प पेश करती है।
संस्थान ने पूरी तरह से मछली बाजार के कचरे से दो नये उत्पाद ‘सीआईबीए-प्लैंकटनप्लस' और 'सीआईबीए-हॉर्टीप्लस' तैयार किये हैं।
ये उत्पाद मछली के कचरे के वैज्ञानिक निपटान और मिट्टी की उर्वरता एवं कृषि उत्पादकता बढ़ाने वाले पर्यावरण-अनुकूल पोषक तत्वों की बढ़ती जरूरत, इन दोनों चुनौतियों से एक साथ निपटकर दोहरा फायदा पहुंचाते हैं।
भारत में इस समय प्रत्येक वर्ष करीब 195 लाख टन मछली का उत्पादन होता है। इससे 60 लाख टन से अधिक मछली का कचरा निकलता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस बिना इस्तेमाल वाले संसाधन से प्रत्येक वर्ष करीब 48 लाख टन 'सीआईबीए-प्लैंकटनप्लस' और तीन लाख टन 'सीआईबीए-हॉर्टीप्लस' बनाने की क्षमता है। इससे पर्यावरण पर पड़ने वाले एक बड़े बोझ को कीमती कृषि उत्पाद में बदला जा सकता है।
आईसीएआर-सीआईबीए के निदेशक डॉ. कुलदीप के लाल के अनुसार, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, केरल, तमिलनाडु और ओडिशा में खेतों पर किये गये बहु-स्थानिक परीक्षणों में एक्वाकल्चर में 'सीआईबीए-प्लैंकटनप्लस' के शानदार फायदे देखे गये हैं। मछली और झींगा तालाबों में इस उत्पाद के इस्तेमाल से प्रति हेक्टेयर उत्पादन में 0.6 से 0.8 टन की बढ़ोतरी हुई। उनके जीवित रहने की दर में 10 से 15 प्रतिशत का सुधार हुआ और चारे की जरूरत में 20 से 50 प्रतिशत तक की कमी आयी।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने से भारत के अनुमानित 123 लाख हेक्टेयर एक्वाकल्चर संभावित क्षेत्र से अतिरिक्त 49.2 लाख टन मछली और झींगे का उत्पादन हो सकता है। यह राष्ट्रीय मछली उत्पादन और किसानों की आय को काफी बढ़ा देगा।
इस जैव-उर्वरक ने खेती में भी काफी अच्छे नतीजे दिखाये हैं। धान और सब्जियों की फसलों पर किये गये कृषि परीक्षणों से पता चला कि उत्पादकता प्रभावित किये बिना रासायनिक खादों के इस्तेमाल में भारी कमी आयी है।
धान की खेती में 'सीआईबीए-प्लैंकटनप्लस' का पत्तियों पर छिड़काव करने से नाइट्रोजन उर्वरक (यूरिया) की भारी बचत हुई, जबकि बीन्स, पालक, बंदगोभी, फूलगोभी और चुकंदर सहित सब्जियों की फसलों की पैदावार में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया।
दूसरा उत्पाद 'सीआईबीए-हॉर्टीप्लस' है, जो प्रसंस्कृत मछली के कचरे से तैयार किये गये पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद है। प्रति हेक्टेयर 1.5 से 2.0 टन के इस्तेमाल से आलू की पैदावार में 23.8 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गयी। इसके साथ ही इसने प्रति हेक्टेयर 100 से 150 किलोग्राम डीएपी उर्वरक की जरूरत को सफलतापूर्वक पूरा किया, जिससे मिट्टी की उर्वरता में सुधार हुआ और फसलों में खनिजों की मात्रा भी बढ़ी।
इस नवाचार के पीछे काम करने वाली वैज्ञानिक टीम का नेतृत्व करने वाले आईसीएआर-सीआईबीए के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. देबासिस डे ने बताया कि ये उत्पाद न केवल फसल उत्पादकता बढ़ाते हैं, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य को सुधारने और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
इस तकनीक की क्षमता के मद्देनजर महाराष्ट्र सरकार ने मुख्यमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मछली के कचरे के रिसाइक्लिंग और 'प्लैंकटनप्लस' एवं 'हॉर्टीप्लस' के उत्पादन को शामिल किया है। सरकार उत्पादन इकाइयां लगाने और इसे बढ़ावा देने के लिए लाभार्थियों को 75 फीसदी वित्तीय सहायता दे रही है।
इसे बड़े पैमाने पर फैलाने के लिए आईसीएआर-सीआईबीए ने तटीय मछुआरा स्वयं सहायता समूहों, मछली किसान उत्पादक संगठनों और उद्यमियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम शुरू किये हैं। पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में उत्पादन इकाइयां पहले ही स्थापित की जा चुकी हैं, जो रोजगार के अवसर पैदा करने के साथ-साथ मछली के कचरे के बेहतर प्रबंधन के जरिये स्वच्छ भारत मिशन के उद्देश्यों को भी पूरा कर रही हैं।
प्राकृतिक खेती, टिकाऊ कृषि और सर्कुलर बायोइकोनॉमी मॉडल पर बढ़ते जोर के बीच, 'सीआईबीए-प्लैंकटनप्लस' और 'सीआईबीए-हॉर्टीप्लस' जैसे मछली के कचरे पर आधारित जैव-उर्वरक खादों के आयात को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। ये पर्यावरण प्रदूषण को न्यूनतम करने, मिट्टी की सेहत सुधारने और भारत की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत करने की भी क्षमता रखते हैं।
चूंकि देश कृषि क्षेत्र की उभरती चुनौतियों के लिए मजबूत और टिकाऊ समाधान तलाश रहा है, इसलिए आईसीएआर-सीआईबीए का यह 'अपशिष्ट से संपदा' नवाचार वैज्ञानिक सूझबूझ के एक ऐसे मॉडल के रूप में सामने आया है, जो किसानों, मछुआरों, उपभोक्ताओं और पर्यावरण सभी को एक साथ लाभ पहुंचाता है।
आलम.श्रवण
वार्ता
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