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पाकिस्तान सरकार हिन्दू–सिख धार्मिक धरोहर के प्रति वैरभाव रखती है, अधिकतर धार्मिक स्थल बूचड़खानों में तबदील : सरचांद सिंह ख्याला

अमृतसर, 11 सितम्बर (वार्ता) पंजाब में भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता प्रोफेसर सरचांद सिंह ख्याला ने गुरुवार को कहा कि पाकिस्तान सरकार और उसकी संस्था इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) सिख, हिन्दू और बौद्ध धार्मिक धरोहर के प्रति नकारात्मक और वैरपूर्ण रवैया रखती है।
प्रो. ख्याला ने पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय समझौतों के उल्लंघन का आरोप लगाया और याद दिलाया कि पाकिस्तान सरकार की यह कार्रवाई 1950 के नेहरू–लियाक़त समझौते और 1955 के पंत–मिर्ज़ा समझौते का स्पष्ट उल्लंघन है, जिनमें अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों और संपत्तियों की सुरक्षा की गारंटी दी गई थी। उन्होंने कहा कि ईटीपीबी का मूल काम गुरुद्वारों और मंदिरों की देखरेख, ज़मीनों की लीज़, चैरिटेबल कार्य और श्रद्धालुओं को सुविधाएँ उपलब्ध कराना था, लेकिन यह संस्था ज़मीन बेचने और कब्ज़ों को वैध ठहराने वाले माफ़िया की तरह काम कर रही है। इस बोर्ड के बड़े पदों पर ग़ैर–सिख बैठे हैं, जिससे सिख समुदाय अपने धार्मिक स्थलों से दूर कर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि जहाँ ईटीपीबी की सालाना आय 565 करोड़ रुपये से अधिक है, वहाँ केवल 21 गुरुद्वारों और 14 मंदिरों की देखभाल की जा रही है, जबकि हज़ारों ऐतिहासिक धार्मिक स्थल अत्यंत दयनीय और बर्बादी की स्थिति में हैं, इतने जर्जर कि मामूली बारिश में ढह जाते हैं। अनेक स्थल ज़मींदोज़ हो चुके हैं, कई पर भू–माफ़िया का अवैध कब्ज़ा है, तो कई को स्थानीय लोगों ने मवेशियों के बाड़े में बदल दिया है। कुछ स्थलों पर स्कूल, थाने और यहाँ तक कि कई गुरुद्वारों की ज़मीन पर बूचड़ख़ाने तक खोल दिए गए हैं।
प्रो. ख्याला ने कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड ने कुल आय में से केवल 113 करोड़ रुपये चुनिंदा धार्मिक स्थलों की देखभाल के लिए खर्च किए हैं, जबकि बाकी 452 करोड़ रुपये अपने कर्मचारियों की तनख्व़ाहें, पेंशन, हाउसिंग और कर्ज़ की सुविधाओं पर खर्च कर दिए गए। सवाल यह है कि कर्मचारियों पर इतनी बड़ी रक़म खर्च करने के बावजूद हिन्दू–सिखों के मंदिर और गुरुद्वारे अपनी पहचान क्यों खो रहे हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान करतारपुर कॉरिडोर का दिखावा करके स्वयं को धार्मिक स्वतंत्रता का समर्थक साबित करने की कोशिश करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि लाहौर, सियालकोट, साहिवाल और ननकाना साहिब जैसे ऐतिहासिक केन्द्रों के गुरुद्वारे बर्बादी के कगार पर हैं। यह दोहरा मापदंड साफ़ दर्शाता है कि पाकिस्तान सरकार धार्मिक विरासत की नहीं, बल्कि केवल अपने राजनीतिक मक़सदों की परवाह करती है। करतारपुर गलियारे का इस्तेमाल करके भी पाकिस्तान विश्व बिरादरी में चरमपंथ समर्थक देश होने का दाग़ नहीं धो सकेगा, न ही सिखों को गुमराह करने में सफल होगा।
पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (पीएसजीपीसी) को अमृतसर की शिरोमणि कमेटी की तरह प्रस्तुत किया जाता है लेकिन वास्तव में यह एक डमी कमेटी है, जिसके फ़ैसले ईटीपीबी और आईएसआई की निगरानी में होते हैं। कमेटी को किसी भी धार्मिक मामले में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। यह केवल ईटीपीबी को सुझाव देने तक सीमित है। बोर्ड और कमेटी में काम करने वाले 70 फ़ीसदी से अधिक लोग मुसलमान हैं, जिन्हें सिख सिद्धांतों और मर्यादा से कोई लेना–देना नहीं। नए सजे सिखों को आगे लाने की कोशिश की जाती है क्योंकि असली सिख कार्यालयों में चल रही नशे–सिगरेट की संस्कृति का विरोध करते हैं। जो भी सच की बात करता है, उसे किनारे कर दिया जाता है।
अनुमान के मुताबिक़ पाकिस्तान में लगभग 517 गुरुद्वारे और 1130 हिन्दू मंदिर थे। इनकी हालत इतनी दयनीय है कि अप्रैल 2024 में पाकिस्तान संसद में सांसद सेजरा अली खान ने ननकाना साहिब की 20 हज़ार एकड़ ज़मीन पर अवैध कब्ज़ों का मुद्दा उठाया और ईटीपीबी के ख़िलाफ जाँच की माँग की। फरवरी 2025 में पाकिस्तान के धार्मिक मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ईटीपीबी का रिकॉर्ड तक जब्त किया। रिपोर्ट में सामने आया कि गुरुद्वारा बेबे नानकी, डेरा चाहल और लाहौर की 800 करोड़ की ज़मीन रिहायशी कॉलोनियों के लिए बेच दी गई। रावलपिंडी का गुरुद्वारा श्री दमदमा साहिब बूचड़ख़ाने और मांस की दुकानों में बदल गया। साहिवाल का गुरुद्वारा गुरु सिंह सभा पुलिस थाने में तब्दील कर दिया गया। गुरु हरगोबिंद साहिब से जुड़ा गुरुद्वारा किला साहिब अवैध कब्ज़ों के अधीन है। सियालकोट का गुरुद्वारा बाबे दी बेर अब एक झूठे पीर की मज़ार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। गुरुद्वारा मंजी साहिब, पसरोर का सरोवर दलदल में बदल गया है। कसूर का गुरुद्वारा भाई फेरू अब मवेशियों का बाड़ा बन चुका है।
प्रो. ख्याला ने कहा कि पाकिस्तान एक इस्लामिक देश है लेकिन उसके संविधान के अध्याय–2 की धारा 20 में हिन्दू–सिख समुदाय को धार्मिक अधिकारों की गारंटी देने के बावजूद सरकार उनकी धार्मिक धरोहर को मिटाने की साज़िश कर रही है। यह न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि अल्पसंख्यकों के भरोसे की खुली अवमानना भी है। इस उल्लंघन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया जाना चाहिए। भारत सरकार, संयुक्त राष्ट्र संगठन और वैश्विक धार्मिक संगठन इस गंभीर मामले में तुरंत हस्तक्षेप करें।
ठाकुर, उप्रेती
वार्ता
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