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राष्ट्र सेवा का पवित्र कार्य है प्राकृतिक खेती: देवव्रत

गांधीनगर, 30 जुलाई (वार्ता) गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने बुधवचार को यहां कहा कि प्राकृतिक खेती एक आंदोलन नहीं, बल्कि राष्ट्र और मानवता की सेवा का पवित्र कार्य है, जिसमें जल, जमीन, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की रक्षा निहित है।
श्री देवव्रत ने कहा कि यह मिशन केवल औपचारिकता नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरी ईमानदारी, समर्पण और आत्मबल से किया जाना चाहिए। उन्होंने आज भास्कराचार्य अंतरिक्ष अनुप्रयोग एवं भू-सूचना संस्थान (बायसेग) के माध्यम से पूरे प्रदेश के कलेक्टर्स, जिला विकास अधिकारी, कृषि विभाग, बागवानी विभाग, आत्मा परियोजना से जुड़े अधिकारियों, कृषि सखियों, किसान मित्रों और कृषि सहायकों से वर्चुअल संवाद किया। राज्यपाल ने अधिकारियों से अपील की कि वे इस मिशन को महज औपचारिकता न समझें, बल्कि इसे धर्म और पुण्य का कार्य मानते हुए पूरे समर्पण से करें।
उन्होंने कहा कि इस मिशन से जुड़कर आप धरती, जल, गोमाता और मानव जीवन की रक्षा कर रहे हैं। उन्होंने सभी अधिकारियों से आग्रह किया कि वे इस अभियान को अपने दायित्व से भी बढ़कर, मानव सेवा और प्रकृति रक्षा के संकल्प के रूप में लें और आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, समृद्ध और स्वस्थ भविष्य देने में भागीदार बनें।
इस संवाद कार्यक्रम में कृषि विभाग के अपर सचिव पी. डी. पलसाणा, कृषि निदेशक प्रकाश रबारी, बागबानी निदेशक एच. एम. चावड़ा, आत्मा निदेशक संकेत जोशी सहित प्रदेश के सभी जिलों के कलेक्टर, डीडीओ, जिला विकास अधिकारी तथा कृषि विभाग के अधिकारी ऑनलाइन जुड़े।
राज्यपाल ने अपने उद्बोधन में कहा कि प्रदेश प्रशासन और कृषि विभाग की जिम्मेदार टीम प्राकृतिक कृषि मिशन को पूर्ण समर्पण के साथ लागू करें। उन्होंने कहा कि यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश और मानवता के दीर्घकालिक हित में राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य है जल, जमीन, जन और जैव विविधता की रक्षा करना।
श्री आचार्य देवव्रत ने कहा कि कैंसर, हार्ट अटैक, किडनी फेल्योर जैसी गंभीर बीमारियां रासायनिक खेती से उत्पन्न हो रहे जहर के कारण बढ़ रही हैं। उन्होंने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि 105 माताओं के दूध में कीटनाशक पाए गए, जो हमारी खाद्य श्रृंखला की भयावह स्थिति को दर्शाता है।
राज्यपाल ने कहा कि गुजरात की चारों कृषि विश्वविद्यालयों ने तीन वर्षों के अनुसंधान के बाद स्पष्ट किया है कि प्राकृतिक खेती में उत्पादन में कोई कमी नहीं आती। बल्कि आने वाले वर्षों में भूमि की उर्वरता बढ़ने से उत्पादन में वृद्धि संभव है। हजारों किसान अपने अनुभव के आधार पर यह प्रमाणित कर चुके हैं।
श्री आचार्य देवव्रत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे रासायनिक, जैविक और प्राकृतिक खेती के बीच मूलभूत अंतर को गहराई से समझें और समझाएं। प्राकृतिक खेती में किसान को न कोई बाहरी इनपुट खरीदने की जरूरत होती है, न कोई अतिरिक्त खर्च। देशी गाय, खेत की मिट्टी, गुड़, बेसन, गोबर-गोमूत्र जैसे स्थानीय संसाधनों से ही प्राकृतिक खेती संभव है।
राज्यपाल ने बताया कि प्रत्येक तीन गांव के क्लस्टर में प्रशिक्षित कृषि सखी और किसान मित्र को नियुक्त किया गया है, जिन्हें मासिक 6000 रुपये प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि चयन केवल उन्हीं व्यक्तियों का हो जो स्वयं प्राकृतिक खेती कर रहे हों और जिनके खेत में इसका मॉडल मौजूद हो।
अनिल सैनी
वार्ता
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