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लोकरूचि.रक्षाबंधन दो अंतिम गोरखपुर

संस्कृत के प्रखान्ड विद्वान एवं सुप्रसिध्द कथावाचक आचार्य शुत्रघ्न प्रसाद मिश्रा ने बताया कि एक तबका अभी भी इस पवित्र और निरूस्वार्थ प्रेम को जीवंत किए हुए है। वह बाजार से कच्चे सूत की डोरी बंधवा कर ही रक्षाबंधन का त्योहार बड़े चाव के साथ मनाते हैं। वहां बहनों को न तो मंहगे तोहफे की आकांक्षा रहती है और न ही ऊंचे दामों वाली राखी के खरीदने की अभिलाषा। उनकी आंखो में न तो ऊंचे ख्वाब है और न ही दिखावे की जिन्दगी। वह यथार्थ में जीने के कायल
हैं। वह भाई को लाल.पीले सूत से तैयार राखी भेजती हैं।
रक्षाबंधन सभी पर्वों में एक अनोखा पर्व ही नहीं बल्कि भारत की संस्कृति तथा मानवीय मूल्यों को प्रत्यक्ष करने वाला अनेक आध्यात्मिक रहस्यों को प्रकाशित करने वाला और भाई बहन के रिश्ते की स्मृति दिलाने वाला एक उपहार है।भाई.बहन को स्नेह की डोर में बांधता है। यह पर्व भारतीय समाज में इतनी व्यापकता और गहराई से समाया हुआ है कि इसका सामाजिक महत्त्व तो है ही, धर्म पुराण इतिहास साहित्य और फ़िल्में भी इससे अछूते नहीं हैं।
आचार्य मिश्रा ने कहा कि सगे भाई बहन के अतिरिक्त अनेक भावनात्मक रिश्ते भी इस पर्व से बँधे होते हैं जो धर्म
जाति और देश की सीमाओं से परे हैं। रक्षाबन्धन आत्मीयता और स्नेह के बन्धन से रिश्तों को मज़बूती प्रदान करने का पर्व
है। यही कारण है कि इस अवसर पर न केवल बहन भाई को ही अपितु अन्य सम्बन्धों में भी रक्षा या राखी बाँधने का प्रचलन है। गुरु शिष्य को रक्षासूत्र बाँधता है तो शिष्य गुरु को।
भारतीय धर्म संस्कृति के अनुसार रक्षाबन्धन का त्योहार श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रक्षाबंधन एक
समाजिक, पाैराणिक, धार्मिक और ऐतिहासिक भावना के धागे से बना एक ऐसा पावन बंंधन है जिसे केवल भारत में ही
नहीं बल्कि नेपाल और मॉरिशस में भी मनाया जाता है। राखी का त्यौहार कब शुरू हुआ इसका कहीं कोई वर्णन नहीं मिलता। इसके साथ अनेक मिथक एवं कथाएं जुड़ी हैं। इंद्राणी के इंद्र को रक्षा सूत्र बंधने से लेकर कर्मावती.हुमायूं, द्रौपदी. के कृष्ण की उंगली पर पट्टी बांधने तथा राजा पुरू और सिकन्दर की पत्नी रोक्साने की कहानी जैसी मान्यताएं रक्षाबंधन से जुड़ी हैं।
आचार्य ने बताया कि रक्षाबंधन भाई.बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है। राखी की थाली को बहुत शुभ माना जाता है।
ऐसी मान्यता है कि राखी की थाली को सही तरीके से सजाकर राखी बांधी जाए तो भाई को सुखी जीवन और दीर्घ आयु
की प्राप्ति होती है। पूजा की थाली में सबसे पहले राखी जरूर रखें। मान्यता है कि पहली राखी भगवान को अर्पित की
जाती है। ऐसे में बहनें सबसे पहले भगवान को राखी अर्पित करें। उसके बाद ही भाई को राखी बांधें। इस दिन बहनें भाई
की कलाई पर राखी बांधने से पहले आरती की थाली सजाती हैं। थाली में रोली, अक्षत, चंदन, दीपक, राखी और मिठाई
रख कर थाल सजाएं। भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने के बाद आरती उतारनी चाहिए।
उन्होंने बताया कि यह पर्व ही बहुत ही शुभ माना जाता है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार भद्राकाल में भाइयों को
राखी नहीं बांधनी चाहिए। इस दौरान रक्षा बांधना शुभ नहीं माना जाता है।उन्होंने बताया कि सौभाग्य मुहूर्त नौ अगस्त को
पूरा दिन है। उन्होंने बताया कि भद्रा में राखी न बंधवाने के पीछे एक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार लंका के राजा
रावण ने बहन शुर्पणखा से भद्रा के समय ही राखी बंधवाई थी। कहा जाता है कि भद्राकाल में राखी बांधने के कारण ही
रावण का सर्वनाश हुआ था। ऐसे में इसी मान्यता के आधार पर जब भी भद्रा लगी रहती है उस समय बहनें अपने
भाइयों की कलाई में राखी नहीं बांधती है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार भद्रा शनिदेव की बहन है। न्याय के देवता शनिदेव की तरह भद्रा भी उग्र स्वभाव की हैं। कहा जाता है कि भद्रा को ब्रह्मा जी ने शाप दिया कि जो भी भद्राकाल में किसी भी तरह का कोई भी शुभ कार्य करेगाए
उसमें उसे सफलता नहीं मिलेगी।
बहरहाल रक्षा बंधन एक ऐसा बंधन हैए जो भाइयों को अपनी बहनों के प्रति उनके कर्तव्य की याद दिलाता है। साथ ही
बहने भाइयों को लंबी उम्र की दुआएं देती हैं। लेकिन आधुनिकता की इस दौड़ में लोग इस त्योहार की मूल भावना को भूलकर इसे फैशन बना रहे हैं, जिसे धर्म गुरु उचित नहीं मानते और सनातन परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखने को लेकर चिंतित भी हैं।
उदय प्रदीप
वार्ता
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