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ऑस्ट्रेलिया दौरे में भारत के परमाणु, समुद्री एजेंडे के केंद्र में चीन की चुनौती

जयंत राय चौधरी
ऑस्ट्रेलिया दौरे में भारत के परमाणु, समुद्री एजेंडे के केंद्र में चीन की चुनौती

नयी दिल्ली/मेलबर्न, 08 जुलाई (वार्ता) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बुधवार को ऑस्ट्रेलिया पहुंचने के साथ ही भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति का एक महत्वपूर्ण चरण शुरू हो गया।


अधिकारियों के अनुसार, इस दौरे के केंद्र में चीन की बढ़ती सामरिक सक्रियता, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करना तथा ऊर्जा एवं समुद्री सुरक्षा को मजबूत बनाना प्रमुख मुद्दे हैं।

 

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि दोनों देशों के बीच जिन प्रमुख प्रस्तावों पर विचार किया जा रहा है, उनमें ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आयात भी शामिल है। विश्व के कुल यूरेनियम भंडार का एक-चौथाई से अधिक हिस्सा ऑस्ट्रेलिया में है और भारत अपनी प्रस्तावित परमाणु आधारित बिजली परियोजनाओं के लिए इस ईंधन की आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहता है। इन परियोजनाओं से भविष्य में स्थापित होने वाले डाटा सेंटरों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) प्रयोगशालाओं को ऊर्जा उपलब्ध करायी जायेगी।

 

खनन मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यूनीवार्ता से कहा, "चीन की सरकारी खनन कंपनियों की नामीबिया और नाइजर की प्रमुख यूरेनियम खदानों में बड़ी हिस्सेदारी है और कजाखस्तान से होने वाले यूरेनियम निर्यात की सबसे बड़ी खरीदार भी वही हैं। ऐसे में भारत पहले से हुए समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आयात का विकल्प आगे बढ़ा रहा है।"

 

विशेषज्ञों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आयात होने पर भारत में खनन किये गये यूरेनियम का उपयोग अपनी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के लिए किया जा सकेगा। इससे भूमि आधारित मिसाइल प्रणालियों के आधुनिकीकरण, मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल्स (एमआईआरवी) के एकीकरण तथा परमाणु शक्ति संपन्न बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों (एसएसबीएन) के बेड़े के विस्तार की योजनाओं को बल मिलेगा।

 

पूर्व मेजर जनरल और मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान (एमपी-आईडीएसए) के पूर्व उपमहानिदेशक आलोक देब ने कहा, "यह दौरा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समान रणनीतिक हित रखने वाले मध्य शक्तियों के बीच बढ़ते सहयोग का संकेत है। दोनों देशों के बीच होने वाले समझौते सुरक्षा और आर्थिक सहयोग को नयी दिशा देंगे।"

 

अधिकारियों ने कहा कि भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में से कोई भी नया 'ट्रॉपिकल कोल्ड वॉर' नहीं चाहता, लेकिन ये यात्राएं सुरक्षा सहयोग मजबूत करने, आर्थिक संबंधों में विविधता लाने और आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं, ताकि देशों को चीन और अमेरिका के बीच किसी एक पक्ष का चयन करने के लिए मजबूर न होना पड़े। यद्यपि यह दौरा औपचारिक रूप से क्वाड समूह पर केंद्रित नहीं है, फिर भी इसके प्रमुख विषय जैसे महत्वपूर्ण खनिज, आपूर्ति शृंखला, आधारभूत संरचना, समुद्री सहयोग और रक्षा साझेदारी क्वा की प्राथमिकताओं से मेल खाते हैं।

 

विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा, "प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया यात्रा ऐसे समय हो रही है जब हिंद-प्रशांत क्षेत्र चीन के सैन्य विस्तार, आर्थिक दबाव और अमेरिका की दीर्घकालिक क्षेत्रीय प्रतिबद्धता को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के कारण तेजी से बदल रहा है।" उन्होंने कहा कि इस यात्रा का समय भी महत्वपूर्ण है। हाल ही में जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की भारत यात्रा में भी सुरक्षा सहयोग और चीन पर निर्भरता कम करने वाली आपूर्ति शृंखला के निर्माण पर विशेष बल दिया गया था।

 

भारत और ऑस्ट्रेलिया ने पिछले कुछ वर्षों में रक्षा सहयोग को लगातार मजबूत किया है। दोनों देश संयुक्त समुद्री सुरक्षा रोडमैप तथा सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल पर काम कर रहे हैं। चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों और आक्रामक क्षेत्रीय नीति ने दोनों देशों को औपचारिक सैन्य गठबंधन से दूर रहते हुए भी सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है।

 

अधिकारियों का कहना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की भविष्य की भूमिका को लेकर बढ़ती अनिश्चितता और चीन के बढ़ते प्रभाव ने भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को अपनी सामरिक साझेदारियों को और मजबूत करने के लिए प्रेरित किया है।उन्होंने कहा, "भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों मानते हैं कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अमेरिका की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन वहां की घरेलू राजनीतिक परिस्थितियों ने दीर्घकालिक सुरक्षा योजना को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है।"

 

रक्षा सहयोग के अलावा श्री मोदी की वार्ता में व्यापार, निवेश और ऊर्जा सुरक्षा भी प्रमुख विषय होंगे। वर्ष 2022 में भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौते (ईसीटीए) के बाद द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर 54 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो चुका है। दोनों देश अब व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईसीए) पर काम कर रहे हैं, जिससे 2030 तक व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक पहुंचने की संभावना है।

 

अधिकारियों ने बताया कि दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण खनिजों पर पहले ही कई समझौते हो चुके हैं, लेकिन इन खनिजों के प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) पर चीन का वर्चस्व बना हुआ है। इस क्षेत्र में संयुक्त उद्यम स्थापित करने पर भी चर्चा होगी। आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ने की संभावना है। दोनों देश क्वाड पहल के तहत फिजी में बंदरगाह निर्माण परियोजना में पहले से साझेदार हैं, जिसे चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति के जवाब के रूप में देखा जा रहा है।

 

इसके अलावा भारत और ऑस्ट्रेलिया इस वर्ष रक्षा नीति वार्ता में प्रस्तावित संयुक्त समुद्री सुरक्षा सहयोग रोडमैप को भी आगे बढ़ायेंगे। दोनों देशों के रक्षा दस्तावेज हिंद महासागर क्षेत्र में परिचालन सहयोग बढ़ाने पर बल देते हैं। छह वर्ष पुराने पारस्परिक लॉजिस्टिक्स समझौते और हालिया एयर-टू-एयर रीफ्यूलिंग समझौते से दोनों सेनाओं के बीच समन्वय और क्षेत्रीय पहुंच को और मजबूती मिली है।

 

शादाब अशोक
वार्ता

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