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भारत


हसीना के प्रत्यर्पण की मांग से तारिक रहमान की भारत यात्रा पर संशय

नयी दिल्ली, 18 अगस्त (वार्ता) पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण और राजनीतिक शर्तों के कारण बंगलादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की प्रस्तावित भारत यात्रा पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। यात्रा स्थगित होने के संकेत मिलने से कुछ दिन पहले तक ढाका में इस द्विपक्षीय वार्ता के लिए बड़े पैमाने पर कूटनीतिक तैयारियां की जा रही थीं।यूनीवार्ता के देखे गये दस्तावेजों के अनुसार, बंगलादेश के विदेश मंत्रालय की दक्षिण एशिया शाखा ने 10 अगस्त को ही ' बंगलादेश-भारत संबंधों पर ब्रीफ' नाम से एक अद्यतन दस्तावेज तैयार करना शुरू कर दिया था। इसके लिए मंत्रालय की अलग-अलग शाखाओं और इकाइयों से 13 अगस्त तक नयी जानकारी देने को कहा गया था।
बंगलादेश के विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने बताया, "जिन मुद्दों पर ब्रीफ तैयार किये गये, उनमें सीमा-पार जल बंटवारा, जलवायु परिवर्तन, व्यापार और निवेश, तकनीकी सहयोग, सांस्कृतिक व खेल कूटनीति, समुद्री मामले, बंगलादेश-चीन संबंध, रोहिंग्याओं की वापसी, अल्पविकसित देश (एलडीसी) श्रेणी से विकासशील देश के रूप में परिवर्तन और टंगैल साड़ी का जीआई दर्जा शामिल था।"
अधिकारियों ने बताया कि उन्हें नोट तैयार रखने के लिए कहा गया था, क्योंकि यह वार्ता अगस्त के अंत में या सितंबर में संभावित थी।
गंगा जल बंटवारा समझौता, जिसे फरक्का समझौते के नाम से भी जाना जाता है, इस वर्ष दिसंबर में समाप्त हो रहा है। बंगलादेशी राजनयिकों के लिए इसके नवीनीकरण या नये सिरे से करार का मुद्दा सबसे अहम था और उनके ब्रीफिंग नोटों का बड़ा हिस्सा इसी पर केंद्रित था।
दस्तावेजों से पता चलता है कि इस प्रक्रिया में चीन के साथ बंगलादेश के संबंधों का नवीनतम आकलन भी शामिल था, जिसमें बेल्ट एंड रोड पहल (बीआरआई), चीनी निवेश और चीनी वित्तपोषित परियोजनाएं शामिल थीं। इसी तरह बंगलादेश-अमेरिका संबंध और दक्षिण एशिया के प्रति अमेरिकी नीति को भी इसमें शामिल किया गया था।
अधिकारियों ने कहा, "चीनी निवेश को लेकर भारत की चिंताओं के कारण ही चीन-बंगलादेश संबंधों और बेल्ट एंड रोड पहल पर स्पष्टीकरण वाले ब्रीफ तैयार किये गये थे।"
माना जाता है कि चीन मोंगला बंदरगाह और तीस्ता जल भंडारण कार्यक्रम को विकसित करने में रुचि रखता है, जो भारतीय सीमा के बेहद करीब हैं।
प्रस्तावित बातचीत के लिए पहचाने गये अन्य मुद्दों में रूस-यूक्रेन युद्ध और इस संघर्ष पर बंगलादेश का रुख शामिल था।
ब्रिक्स, सार्क, बिम्सटेक, राष्ट्रमंडल और संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संगठनों व समूहों में बंगलादेश-भारत सहयोग पर बंगलादेश चर्चा की तैयारी कर रहा था।
प्रस्तावित ब्रीफिंग में अर्थव्यवस्था और व्यापार से जुड़े मामलों को भी शामिल किया गया था। इनमें संयुक्त राष्ट्र की 'सबसे कम विकसित देशों' की श्रेणी से बंगलादेश का बाहर निकलना (जिससे उसके निर्यात पर टैरिफ बढ़ सकता है), टंगैल साड़ी को 'भौगोलिक संकेतक' (जीआई) का दर्जा मिलना और व्यापक बहुपक्षीय आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दे शामिल थे।
म्यांमार की स्थिति और रोहिंग्या संकट पर भी चर्चा होनी थी। इसमें चीन, भारत और आसियान की भूमिकाओं के मद्देनजर उन लगभग 10 लाख लोगों की वापसी की कोशिशों पर विचार किया जाना था, जिन्होंने बंगलादेश में शरण ली है।
संभावित एजेंडा दक्षिण एशिया से आगे तक फैला हुआ था। इसमें पश्चिम एशिया संकट और इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के साथ-साथ यूरोपीय संघ (ईयू)-भारत संबंधों और सहयोग को भी विषयों के रूप में शामिल किया गया था।
दस्तावेज में शामिल मुद्दों का दायरा दर्शाता है कि इस प्रस्तावित यात्रा को न केवल तात्कालिक राजनीतिक मतभेदों को सुलझाने, बल्कि दोनों पड़ोसी देशों के सामने मौजूद रणनीतिक, आर्थिक, सुरक्षा और क्षेत्रीय सवालों के व्यापक ढांचे पर चर्चा के अवसर के रूप में देखा जा रहा था।
आधिकारिक सूत्रों ने कहा, "इस नोट में बातचीत के लिए कोई खास रुख या नीतिगत सिफारिशें तय नहीं की गयी थीं। इसके बजाय यह मुख्य रूप से जानकारी इकट्ठा करने की एक समन्वित कवायद थी, जिसमें विदेश मंत्रालय के विभिन्न विभागों को नवीनतम जानकारी मुहैया कराने का काम सौंपा गया था। इस जानकारी का इस्तेमाल प्रधानमंत्री के लिए एक व्यापक ब्रीफ तैयार करने में किया जाना था।"
इस कवायद का समय बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बंगलादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी के साथ हुई बैठक के समय ही हो रही थी।
यह यात्रा हालांकि अब राजनीतिक विवादों में घिर गयी है। बंगलादेशी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत में मौजूद पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण और अन्य घरेलू मांगों को पूरा किये बिना प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत यात्रा के लिए अनुकूल माहौल नहीं बन पायेगा।
पंकज, आलम
वार्ता
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