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बुंदेलो की शौर्य गाथा ‘आल्हा’ पर गुमनामी का साया

बुंदेलो की शौर्य गाथा ‘आल्हा’ पर गुमनामी का साया

महोबा 04 अगस्त (वार्ता) मातृ भूमि की आन,बान और शान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले 12वीं सदी के बुंदेले शूरवीरों की लोक शौर्य गाथा ‘आल्हा’ के अस्तित्व पर संकट छाने लगा है।


       सामाजिक परिवेश में सोशल मीडिया और यू-ट्यूब के व्यापक प्रभाव के चलते परंपरागत लोक गायन आल्हा को सुनने वाले शौकीनों की घटती संख्या और अल्हैतो आल्हा गायकों की नई पीढ़ी तैयार न होने से यह अपने ही वतन में गुमनामी का शिकार हो चला है। लोक संस्कृति के चितेरे आल्हा की घट रही लोकप्रियता पर चिंतित है।

      प्राणों में चेतना, बाजुओं में फड़कन ओर रक्त में उबाल पैदा कर देने वाला वीर रस का अप्रतिम महाकाव्य आल्हा कुछ समय पूर्व तक उत्तर भारत की चौपालों में खूब रंग जमाता था। सावन की रिमझिम फुहारों के बीच सांझ का धुंधलका गहराते ही गांव की चौपालों में ढोलक की थाप के साथ अल्हैत अपने ओजपूर्ण स्वर बिखेरते थे तो इसके शौकीन खिंचे चले आते थे।

     एक बार महफ़िल जमी तो कब रात बीत गई और दिन चढ़ आया इसका भान ही नही होता था। हरेक बार सुनने पर नई ऊर्जा प्रदान करने वाले आल्हा में महोबा के चंदेल साम्राज्य के दो सेनानायको आल्हा ओर ऊदल की अदम्य शूरवीरता का वर्णन है जिसे उन्होंने आपने राज्य की ओर से लड़े गए विभिन्न युद्धों में प्रदर्शित किया था। इसमें वर्ष 1182 में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान की सेना के साथ लड़ा गया युद्ध प्रमुख है। दिल्ली दरबार के राजकवि चंद्रवरदाई ने पृथ्वीराज रासो ओर जनकवि जगनिक ने आल्हा खंड के रूप में इस गौरव गाथा की रचना की। हालांकि जगनिक रचित आल्हा अब उपलब्ध नही है।

      देशी रियासत के काल मे आल्हा खासा लोकप्रिय था। तब सैनिक सामूहिक गायन कर इसका आनंद लेते थे। आजादी के दीवाने महान क्रांतिकारी चंद्र शेखर आजाद,भाई परमानंद,दीवान शत्रुघन सिंह आदि की तो दिनचर्या में यह सम्मिलित था। दूसरे विश्व युद्ध मे भारतीय सैनिकों में जोश का संचार करने के लिए आल्हा की पुस्तकें कानपुर के श्रीकृष्ण पुस्तकालय से मंगा कर वितरित कराई गई थी।

चार दशक पहले तक जावा, सुमात्रा आदि में रहने वाले भारत वंशियो की मांग पर आल्हा के पार्सल इसी पुस्तकालय से भेजे जाते थे। आल्हा की मूल प्रति उपलब्ध न होने के कारण विभिन्न रचनाकारो की कृतियों में विसंगतियां ओर भिन्नता है।

      जगनिक शोध संस्थान के सचिव डा वीरेंद्र निर्झर के अनुसार साढ़े आठ सौ साल से गुरु शिष्य परंपरा में एक स्वर से दूसरे स्वर की यात्रा तय कर आल्हा ने लोक प्रियता के अनेक मुकाम तय किये है। यह पूरे देश मे अवधी, कन्नौजी, भोजपुरी, कानपुरी ओर बुंदेलखंडी समेत अनेक शैलियों में गाया जाता है। वाद्ययंत्रों का अधिक समावेश न होने से बुंदेलखंडी शैली श्रोताओं में विशेष लोकप्रिय है। परंतु पारंपरिक गायक घरानों से अब नए गायकों के न आने से यह शैली लुप्त होती जा रही है।

      डा निर्झर बताते है कि अनेक क्षेत्रीय भाषाओं के अलावा आल्हा की रचना अंग्रेजी भाषा में भी की गई है। तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर चार्ल्स इलियट ने 1865 में इसे लिपिबद्ध ओर 1871 में प्रकाशित कराया था। सर वाटर फील्ड ने 1923 में इसका अनुवाद कराया था। आल्हा की लोकप्रियता में बॉलीवुड के छोटे और बड़े पर्दे ने भी अहम भूमिका निभाई है। 

      टेलीविजन के लोकप्रिय सीरियल रामायण के द्वंद युद्ध के विभिन्न दृश्यों व अनेक फिल्मों के पार्श्व गीत संगीत में आल्हा का इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा कैसेट ओर सीडी के जरिये भी आल्हा ने घर घर में पहुंच बनाई लेकिन इसके बावजूद भी यह अपनी उचित पहचान कायम नही कर सका।

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