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वेटलैंडो के सिकुडने से सारस पक्षी की तादात में आ रही है लगातार गिरावट

वेटलैंडो के सिकुडने से सारस पक्षी की तादात में आ रही है लगातार गिरावट

इटावा , 01 फरवरी(वार्ता)उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में वेटलैंडो (आर्द्रभूमि)के सिकुड़ने के कारण सारस पक्षियों की संख्या में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है।

       आजादी के समय भारत में सात फीसदी भूभाग वेटलैंड था जो अब घटकर चार फीसदी से कम रह गया है। जलयुक्त दलदली वन भूमि के सिकुडने के कारण सारस की संख्या मे लगातार बड़ी गिरावट सामने आती जा रही है। पूरे विश्व का पांच फीसदी भूभाग वेटलैंड है। विश्व के 40 फीसद सारस उत्तर प्रदेश में वास करते हैं।

        भारतीय वन्य जीव संस्थान,( देहरादून) के संरक्षण अधिकारी डाॅ0 राजीव चौहान ने यहां बताया कि जब तक उत्तराखंड अलग राज्य नहीं बना था तो उत्तर प्रदेश की सबसे अधिक जैव विविधता उत्तराखंड इलाके में थी। बंटवारे के बाद उत्तर प्रदेश की 45 फीसदी जैव विविधता यहां बिखरे पड़े वेटलैंड में समाहित है। ये वेटलैंड वातावरण से कार्बन डाई आक्साइड का अवशोषण कर ग्लोबल वार्मिग को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं ।

         उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य वन्यजीव संरक्षक रूपक डे ने शुक्रवार को यहां बताया कि विश्व में एक लाख से ज्यादा वेटलैंड क्षेत्र हैं। दुनिया भर में 30 से 35 हजार सारस पाए जाते हैं जिनमें 20 से 25 हजार भारत में हैं। इनमें 14 हजार उत्तर प्रदेश में हैं। राज्य में विश्व के 40 फीसद सारस वास करते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि क्रेन विलुप्तप्राय पक्षियों में एक है। इनकी विश्व में पाई जाने वाली 15 में से 11 प्रजातियों के पक्षियों की संख्या निरंतर घट रही है।

श्री डे ने बताया कि भारत में इनकी की छह प्रजातियां हैं, जिसमें सारस सर्वाधिक लोकप्रिय है। इटावा और आसपास का क्षेत्र सारस की स्वभाविक राजधानी हैं। अब यहां के वेटलैंड अतिक्रमण की वजह से कम हो गये है। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश में वेटलैंड (दलदली) क्षेत्र में काफी तेजी से गिरावट आई है। यहां पर दो तिहाई वेटलैंड क्षेत्र घट गया है।

   राज्य के पूर्व मुख्य वन्य जीव संरक्षक मोहम्मद एहसान बताते है कि 1998 में उत्तर प्रदेश में 70.07 हैक्टेयर क्षेत्रफल में वेटलैंड था जो अब घटकर 26.66 हैक्टेयर रह गया है। वेटलैंड क्षेत्र का उपयोग कृषि व विकास के कार्यों में किया जा रहा है। छोटे-छोटे वेटलैंड खत्म हो रहे हैं जो सारस संरक्षण के लिए ठीक नहीं हैं।

     अधिकारिक तौर पर बताया जाता है कि उच्चतम न्यायालय के एक आदेश के बाद उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में वेटलैंड समितियां बनाई गई हैं। वहां के कलेक्टर तथा डीएफओ को वहां मौजूद दलदली इलाकों को संख्या का पता लगाने के लिए कहा गया है लेकिन सतही तौर पर कोई कार्यक्रम ऐसा नही बनाया गया जिससे हकीकत मे बैटलैंड का संरक्षण हो सके।

      सारस उत्तर प्रदेश के समस्त मैदानी क्षेत्रों में देखा जाता है। इटावा, मैनपुरी, औरेया, एटा, अलीगढ़, शाहजहांपुर आदि जिलों में बडे़-बड़े जलीय एवं दलदली क्षेत्र वेटलैंड होने के कारण वहॉ इसके अपेक्षाकृत बड़े झुंड दिखाई पड़ते हैं । वर्ष 2010 में राज्य पक्षी सारस की गणना करवाई गई। सभर 84 वन प्रभागों में इनकी संख्या 11,905 पाई गई । प्रदेश के पांच जिलों में 500 से अधिक सारस पाए गये। मैनपुरी में 2180, इटावा में 1512, औरैया में 652, एटा में 828 व कानपुर देहात में 580 सारस पाए गये। 23 जिलों में 101 से 500 के बीच, छह जिलों में 51 से 100 के बीच तथा 21 जिलों में एक से 50 के बीच सारस पाए गये। किसी भी जलीय एवं दलदली क्षेत्र में सारसों का पाया जाना उस क्षेत्र के स्वस्थ पर्यावरण का सूचक है। जिस पर इनका अस्तित्व निर्भर करता है ।

समाजवादी पार्टी(सपा)अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के गांव सैफई में गत वर्ष 16 फरवरी को आयोजित दो दिन अंतरार्ष्ट्रीय सारस संगोष्ठी में कंबोडिया से आए शोधकर्ता वेंजेलिंग ने बताया कि उनके देश में सारसों की संख्या एक हजार से भी अधिक है । कंबोडिया में सारस आस्था का प्रतीक है। यहां के ऐतिहासिक मंदिरों में सारस के क्षेत्र मिलेंगे।

       उन्होने बताया कि सारस के लिए धान की दलदली जमीन सबसे मुफीद मानी जाती है । समान और सरसईनावर क्षेत्र में ऐसी दलदली जमीन है। ये खेत पूरी तरह वेटलैंड जैसे हो जाते हैं, इसलिए यहां सारस बसाए जा सकते हैं। संगोष्ठी में जुटे नौ देशों के विशेषज्ञों ने माना है कि उनके देशों में इस तरह की संगोष्ठी संभव नहीं, जिसमें सिर्फ एक विभाग नहीं बल्कि प्रदेश के मुख्यमंत्री शामिल होकर सारस और वेटलैंड पर चिंतन करें। ऐसे में सभी ने उत्तर प्रदेश को सारस और वेटलैंड संरक्षण के लिए ग्लोबल लीडर बनाने पर सहमति जताते हुए प्रस्ताव को पास कर दिया।

        इस बाबत अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय क्रेन फाउंडेशन के साथ हुए समझौते को भी सार्वजनिक किया गया । इसमें सबसे अहम है कि अगले दस वर्षों तक भारत, अमेरिका के साथ मिलकर सारस और वेटलैंड संरक्षण का कार्य करेगा। संगोष्ठी में शामिल टाटा समूह के डाॅ0 समीर सिन्हा ने देश के साथ विदेशों में भी सारस संरक्षण पर सहयोग की घोषणा की। अभी भी सारस संरक्षण की दिशा मे किसी भी स्तर पर कही पर कोई कार्य होता हुआ नही दिख रहा है।

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