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लोकरुचि


होली पर पहले जैसी अब नही दिखती फाग की फुहारें

होली पर पहले जैसी अब नही दिखती फाग की फुहारें

इटावा, 20 मार्च (वार्ता) उत्तर प्रदेश के इटावा में होली का त्योहार आते ही कभी ढोलक की थाप और मंजीरों पर चारों ओर फाग गीत गुंजायमान होने लगते थे, लेकिन आधुनिकता के दौर में आज ग्रामीण क्षेत्रों की यह परम्परा लुप्त सी हो गई है ।


      एक दशक पूर्व तक माघ महीने से ही गांव में फागुनी आहट दिखने लगती थी, लेकिन आज फागुन माह में भी गांव फागुनी महफिलों से अछूते नजर आ रहे हैं । आज जहां पुष्प मंजरी, बसंत की अंगड़ाई, पछुआ हवा की सरसराहट फागुन का स्पष्ट संकेत दे रही है लेकिन इस आधुनिकता की दौड़ में हमारी परम्पराएं निढाल हो गई है। फागुन महीने में शहरों से लेकर गांवों तक में फाग गाने और ढोलक की थाप सुनने को लोगों के कान तरस रहे हैं। महाशिवरात्रि का पर्व आते-आते फाग गीतों की धूम मचती थी। ढोल मंजीरे व करताल की आवाजों के बीच फगुआ के गाने गूंजते थे लेकिन आज भेदभाव एवं वैमन्सयता के चलते अब त्योहारों के भी कोई मायने नहीं रह गए हैं।

       इटावा ब्रज क्षेत्र में आता है और यहां पर उसी परम्परा के अनुसार त्योहार भी मनाए जाते हैं लेकिन अब धीरे-धीरे सिर्फ परम्पराओं का निर्वाहन मात्र किया जा रहा है। आज होली पर फाग गायन नहीं बल्कि फिल्मी गीत चारों ओर सुनाई देते हैं।

     लोगों का मानना है कि टीवी की मनोरंजन संस्कृति के चलते जहां पुरानी परम्पराएं दम तोड़ रही है। वहीं आज की युवा पीढ़ी पुरानी संस्कृतियों को सीखना नहीं चाहती है। यही कारण है कि होली के त्योहार पर फाग गायन अब धीरे-धीरे खत्म सा होता जा रहा है।

होली के त्योहार पर फाग गायन का विशेष महत्व है। फाग गायन संगीत की एक विशेष कला है। जिसमें रागों के साथ ताल का भी मेल होता है। जहां गांवों में लंगड़ी व अन्य प्रकार की फाग गायी जाती है। आज विरज में होरी रे रसिया, वह आये नन्द के लाल, मथुरा में केसर बह आई, मोरी चुनरी में पड़ गयो दाग री कैसों चटक रंग डारों, रंग डारो न हम पे पडू पईया, होली खेलन आयो रे घन श्याम, फाग खेलन बरसाने में आये हैं नटवर नन्द किशोर, मिलन सुदामा आए है, श्याम ने बिन पूछे धरी होरी राग व ताल के साथ ढोलक जैसे बाद्य यंत्रों की धुनों पर किया जाता है ।

      महाराज सिंह पाल ने कहा फिल्मी गीतों से आज भी कई गुना अच्छा फाग गायन है। युवा पीढ़ी सीख नहीं रही है और पुराने लोग बचे नहीं है। उनके चाचा मुलू पाल व रामसहाय लखना राज घराने में तीन-तीन दिनों तक फाग गायन करते थे और उन्हें पुरस्कृत भी किया जाता था।

     सच्चिदानंद सिंह ने बताया कि फाग का आयोजन पूरव क्षेत्र के लोग अधिक करते थे। उनके परदादा पूरब के रहने वाले थे और वर्ष 1800 के आसपास यहां आए थे तभी से होली पर फाग गायन का आयोजन किया जाता है। 15 दिन पूर्व से शुरू हो जाता था दूज पर खत्म होता था।

    सूर्यकांत त्रिपाठी ने लोगों में दिनों-दिन प्रेम की भावना गायब होती जा रही है। इसका असर अब त्योहारों पर देखने को मिलता है। पहले लोग मिल जुलकर त्योहार मनाते थे लेकिन अब तो पता ही नहीं चलता है कि कब आया और कब चला गया। अब टीवी से लगे रहते हैं और त्योहारों के महत्व को नहीं समझते।

कमलकांत शर्मा ने बताया कि पुरानी परम्पराओं से आज की युवा पीढ़ी पूरी तरह से अनभिज्ञ है। उन्होंने बताया कि कुछ दशक पहले तक रईसों व जमींदारों के यहां होली के मौके पर धु्रपद व धमार की महफिलें सजतीं थी। धु्रपद शैली में गायी जाने वाली संगीत की विधा धमार ही होरी है।।

     होली के पर्व पर फाग का विशेष महत्व है, लेकिन अब यह फाग संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर है । इसी विलुप्त होती सांस्कृतिक विरासत को इटावा का पुरविया समाज आज भी संजोये हुए हैं। वैसे तो इटावा का वृन्दावन धाम कहे जाने वाले मोहल्ला पुरविया टोला में कभी चारों तरफ फगुआरों की टोलियां फाग गाती हुई निकलतीं थी । इसके अलावा जगह-जगह फाग की महफिलें भी सजतीं थी लेकिन अब यहां पर भी कुछ स्थानों पर सिर्फ परम्परा निभाई जा रही है।

     आज भी पुरविया टोला कटरा में सच्चिदानंद सिंह के आवास पर फाग की महफिल सजतीं है और लोग यहां पर पहुंचकर फाग का लुत्फ उठाते हैं। यहां पर आज भी फाग में सबसे ज्यादा युवा पीढ़ी मौजूद रहती है और जमकर फाग गायन भी करती है ।

सं प्रदीप

वार्ता

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