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सुख-समृद्धि एवं मनोवांछित फल प्राप्ति का पर्व है ‘डाला छठ’

सुख-समृद्धि एवं मनोवांछित फल प्राप्ति का पर्व है ‘डाला छठ’

प्रयागराज,01 नवम्बर (वार्ता) सुख समृद्धि और मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिये सूर्योपासना के महापर्व ‘डाला छठ’ के मौके पर तीर्थराज प्रयागराज में श्रद्धा का सैलाब हिलोरें मार रहा है।


        त्योहारों के देश भारत में कई ऐसे पर्व हैं, जिन्हें काफी कठिन माना जाता है और इन्हीं में से एक लोक आस्था का महापर्व डाला छठ है। छठ पर्व के आयोजन का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी पाया जाता है। इस दिन पुण्यसलिला नदियों, तालाब या फिर किसी पोखर के किनारे पर पानी में खड़े  होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। छठ पूजा की धार्मिक मान्यताएं भी हैं  और सामाजिक महत्व भी है। लेकिन इस पर्व की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें  धार्मिक भेदभाव, ऊंच-नीच, जात-पात भूलकर सभी एक साथ इसे मनाते हैं।

        छठ  पूजा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति  और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के  बर्त्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद और सुमधुर  लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है।

      शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में  गढ़ी गयी उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ न  होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न  पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की। जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के सहयोग  की जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है।

      सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार,  झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता  है। प्रायः हिन्दुओं द्वारा मनाये जाने वाले इस पर्व को इस्लाम सहित अन्य  धर्मावलम्बी भी मनाते देखे गये हैं। धीरे-धीरे यह त्योहार प्रवासी भारतीयों  के साथ-साथ विश्वभर में प्रचलित हो गया है। छठ पूजा सूर्य और उनकी बहन छठी  म‌इया को समर्पित है। बिहार समेत देश के कई राज्यों में छठ पूजा बड़ी  धूमधाम से मनाई जाती है। इस पूजा में भगवान सूर्य की अराधना की जाती है।

छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा  समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते। भैयादूज के  तीसरे दिन से यह आरम्भ होता है। पहले दिन सेन्धा नमक, घी से बना हुआ अरवा  चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है। अगले दिन से उपवास  आरम्भ होता है। व्रति दिनभर अन्न-जल त्याग कर शाम को खीर बनाकर, पूजा करने  के उपरान्त प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं। तीसरे दिन डूबते  हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं। अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को  अर्घ्य चढ़ाते हैं। पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

       इस बार छठ पूजा का यह कार्यक्रम 31 अक्टूबर शाम से शुरु होगा जिसमें पहला  अर्घ्य 2 नवंबर को दिया जायेगा। इसके बाद इसका अंत 3 नवंबर के शाम को दूसरा  अर्घ्य देने के साथ होगा और दूसरे दिन उदयाचल सूर्य को अर्ध्य देकर पर्व का समापन किया जाता है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें न/न केवल उदयाचल सूर्य की पूजा की जाती है बल्कि अस्ताचलगामी सूर्य को भी पूजा जाता है। अथर्ववेद में भी इस पर्व का उल्लेख है।

        लोकआस्था और सूर्य उपासना का महान पर्व छठ पर्व पूरी तरह से श्रद्धा और शुद्धता का पर्व है। इस व्रत को महिलाओं के साथ ही  पुरुष भी रखते हैं। चार दिनों तक चलने वाले लोकआस्था के इस महापर्व में  व्रती को लगभग तीन दिन का व्रत रखना होता है जिसमें से दो दिन तो निर्जला  व्रत रखा जाता है। व्रत रखने वाली महिलाओं को  परवैतिन कहा जाता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता  है। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नये कपड़े पहनते हैं।

       छठ की पूजा में गन्ना, फल, डाला और सूप  आदि का प्रयोग किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, छठी मइया को भगवान सूर्य की बहन बताया गया हैं। इस पर्व के दौरान छठी मइया के अलावा भगवान  सूर्य की पूजा-आराधना होती है। मान्यता है कि जो व्यक्ति इन दोनों की  अर्चना करता है उनकी संतानों की छठी माता रक्षा करती हैं।

नहाय-खाय के साथ आरंभ हुए लोकआस्था के इस चार दिवसीय महापर्व की शुरूआत कब से हुई इसका कहीं प्रमाणित पक्ष नहीं मिलता। ऋगवेद में इसका वर्णन मिलता है। इसे  लेकर कई कथाएं मौजूद हैं। एक कथा के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव  अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत किया। इससे उनकी  मनोकामनाएं पूर्ण हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। इसके अलावा छठ  महापर्व का उल्लेख रामायण काल में भी मिलता है।

       एक अन्य मान्यता के अनुसार,  छठ या सूर्य पूजा महाभारत काल से की जाती है। कहते हैं कि छठ पूजा की  शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वे  प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य  की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे।

        छठ पूजा मनाने के पीछे दूसरी ऐतिहासिक कथा भगवान राम की है। यह माना जाता है कि 14 वर्ष के वनवास के बाद जब भगवान राम और माता सीता ने अयोध्या वापस आकर राज्यभिषेक के दौरान उपवास रखकर कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष में भगवान सूर्य की पूजा की थी। उसी समय से, छठ पूजा हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण और परंपरागत त्यौहार बन

गया और लोगों ने उसी तिथि को हर साल मनाना शुरु कर दिया।

दिनेश प्रदीप

वार्ता

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