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आध्यात्म,वैराग्य और ज्ञान की ऊर्जा सतत प्रवाहित होती है संगम की रेत में

आध्यात्म,वैराग्य और ज्ञान की ऊर्जा सतत प्रवाहित होती है संगम की रेत में

कुम्भनगर, 04 मार्च (वार्ता) पतित पावनी गंगा, श्यामल यमुना और अन्त: सलीला स्वरूप में प्रवाहित सरस्वती के त्रिवेणी की विस्तीर्ण रेती वैराग्य, ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति से ओतप्रोत है।


          तीर्थराज प्रयाग की महिमा का कोई अंत नहीं है। अरण्य और नदी संस्कृति के बीच जन्म लेकर ऋषियों-मुनियों की तपोभूमि के रूप में पंचतत्वों को पुष्पित-पल्लवित करने वाली प्रयागराज की धरती देश को हमेशा ऊर्जा देती रही है। इसके विस्तीर्ण रेती पर न/न जाने कितने ही साधु-संत, पुण्य आत्मा और ऋषि-मुनियों ने अपने पुण्य से सिंचित किया है।         

        माघ मेला हो या कुम्भ में यहां पंडालों में रामचरित मानस, श्री कृष्ण लीला, भागवत पाठ आदि का लगातार विस्तीर्ण रेती पर निरंतर पाठ चलता है। यहां श्रोता रेत पर ही बैठ कर कथा सुनते हैं। कथा अपने नियत समय पर शुरु होगी और समय से ही समाप्त होगी। पंडालों में पांच स्रोता हो या 500 या फिर कोई भी नहीं, लेकिन कथा अपने नियत समय पर ही समाप्त होगी। तीर्थराज प्रयाग के रेत का शरीर से स्पर्श मात्र से लोगों को रूचि के अनुसार वैराग्य, ज्ञान और आध्यात्मिक संबल मिलता है।

       श्रीदेवरहवा बाबा सेवाआश्रम पीठ के आचार्य रमेश प्रपन्न शास्त्री ने बताया कि यहां का कण-कण यज्ञ मय है। यहां रेत कण में सदियों से ऋषि मुनियों और देवताओं का चरण स्पर्श हुआ है। यहां की रेत केवल वैराग्य, ज्ञान और आध्यात्मिक ऊर्जावान ही नहीं ही बल्कि यह आध्यात्मिक औषधि भी है।

       उन्होंने बताया कि पद्मपुराण के प्रयाग महात्म में रेत के महात्म का विस्तार से वर्णन किया गया है। कुम्भ स्नान से पहले नागा संन्यासी इसी रेत को श्रद्धापूर्वक बैठकर प्रणाम करते हैं। उसके बाद त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाते हैं। उनका मानना है कि उनके गुरू के चरण कभी इसी रेत पड़े थे। श्रद्धालु स्नान करने के बाद यहां की एक मुठ्ठी रेत को ससम्मान अपने साथ लेकर जाते हैं।

       श्रद्धालु संगम की रेत को माथे लगाकर अपने को धन्य मानते हैं। यह वह स्थल हैं जहां सदियों तक ऋषि-मुनि निरंतर यज्ञ करते रहे। यह तप, तपस्या और संस्कार की सरजमीं है। पद्मपुराण में प्रयाग क्षेत्र को यज्ञ भूमि कहा गया है। देवताओं द्वारा सम्मानित इस भूमि में थोड़ा भी दान का अनंत फल प्राप्त होता है। यह 88 हजार ऋषि-मुनियों की तपोभूमि है।

री शास्त्री ने बताया कि इसीलिए यहां भूमि शयन की बात कही गयी है। कल्पवास वैदिक काल की अरण्य संस्कृति से जुड़ा हुआ है। संगम के विस्तीर्ण रेती पर संयम, श्रद्धा एवं कायाशोधन का 'कल्पवास' भी यहीं पर होता है। कल्पवासी एक माह तक रेती पर ही सोते हैं। इस दौरान संगम की रेत पर एक माह तक हवन, पूजा-पाठ, यज्ञ के साथ निरंतन कुछ न कुछ धर्मिक कार्य होते रहते हैं जिससे यहां की रेत आध्यात्मिक ऊर्जा से भरी हुई है।

       उन्होंने बताया कि सनातन संस्कृति में सदैव से यहां पर ऋषि-संत, महात्मा प्रयाग में आते रहे हैं। उनके चरणों के स्पर्श से यह रेत इतनी पावन और ऊर्जावान बन गयी है कि इसके कण आध्यात्मिक औषधि, जो सभी प्रकार से तपोमय है। यहां का रेत देवताओं, यज्ञ, संत-महात्माओं के चरणो द्वारा भी विष्टित है। वेद और पुराणों का हवाला देते आचार्य ने बताया कि यहां ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया।

       आचार्य ने एक वाकया सुनाते हुए कहा कि कोई व्यक्ति देवरहवा बाबा के पास आकर बताया कि उसे कैंसर है। डाक्टरों ने उसके जीवन का अंतिम पहर बता उपचार से मना कर दिया। बाबा ने उससे कहा कि मचान के नीचे की रेत ले जाकर एक ‘चुटकी’ फांका कर। उसका कैंसर ठीक हुआ कि नहीं वह तो पता नहीं लेकिन बैरहना निवासी आर्य मित्र त्रिपाठी की पत्नी के गाल ब्लेडर में पथरी थी। डाक्टरों ने उनसे आपरेशन की बात कही।

      वह बाबा के यहां रोती हुई आयीं और अपनी विपन्नता के साथ व्यथा बयां किया। बाबा ने उनसे सुबह खाली पेट एक चुटकी गंगा का रेत फांकने की बात कही। एक साल के बाद उनकी पथरी गल कर समाप्त हो गई। डाक्टरों को दोबारा दिखाने ने पर उन्होंने इस प्रकार की कोई चीज होने से इंकार कर दिया। बालू के कणों का चमात्कारिक असर तो है। इसीलिए नागा संन्यासी या अन्य श्रद्धालु रेत के कण को अपने मस्तक पर लेपन करते हैं। लेपन करने से बालू की ऊर्जा शरीर में पहुंचती है।

     अमेठी स्थित सगरा आश्रम के पीठाधीश्वर मौनी महराज ने बताया कि त्रिवेणी की रेणुका (रेत) में जो व्यक्ति लेट कर प्रणाम,परिक्रमा और दण्डवत परिक्रमा करता है  उसके पाप नष्ट हो जाते है। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार रेणुका जल को शोषित कर  विशुद्ध कर देती हैं उसी प्रकार इनका शरीर के स्पर्श करने मात्र से ही सभी पाप समाप्त हो जाते हैं।

 मौनी महराज ने कहा कि रेणुका में लेटने से कभी दोष नहीं लगता। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि मिट्टी में लेटने से कपड़े में दाग पड़ जायेगा लेकिन रेणुका में लेटने से कोई दाग नहीं लगता। यह इनकी विशद्धता की पहचान है।

      उन्होंने नागा सन्यांसियों की ओर से रेणुका की मान्यता की विलक्षणता का एक उदाहरण बताया। उन्होने बताया कि नागा संन्यासी यह मानता है कि मां गंगा की रेणुका भष्मी से कम नहीं। संन्यासी जैसे भष्मी लगाता है तो वरज की अनूभूति करता है। बड़े-बड़े विरक्त, संत गंगा की रेणुका को शीष पर रखते हैं। उन्होने बताया कि शिवलिंग में चमक लाने के लिए रेणुका का उपयोग किया जाता है। गंगा में गंगा की रेणुका से शिवलिंग बनाकर पूजन करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

      श्री मौनी बाबा ने बताया कि रास्ते में जब गजानन चलते हैं तब अपनी सूंड से धूल उडाते और अपने मस्तक पर रखते हुए इसलिए चलते हैं कि कभी इसी पथ से बड़े-बड़े यति, महात्मा, सिद्ध संत, विरक्त, तपस्वी और साधक इसी मार्ग से गुजरे होंगे,उनकी दिव्य चरण धूलि को मस्तक पर लगाकर अपने को धन्य होता है।

        रामायण में उल्लेखित और अनेक अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार वनवास के दौरान गंगा नदी को पार करने के बाद भगवान श्री राम, सीता और लक्ष्‍मण के साथ प्रयाग पहुंचे थे।  यह वही स्थान है जबलंका-विजय के पश्चात वापस लौटते समय श्री रामचन्द्र जी यहां पधारे थे। श्रीराम ने रावण का वध करने पर ब्रह्महत्या का दोष से मुक्त होने के लिए अपने हाथों से श्रीरामेश्वरम में उपलब्ध रेत से ज्योर्तिलिंग बनाकर स्थापित किया।

      प्रयाग को यज्ञ की धरती इसलिए भी कहा जाता है कि महर्षि भरद्वाज का आश्रम यहीं स्थापित है।

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