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इस मौके पर भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि यह सम्मेलन हिन्दी के संवर्द्धन, संरक्षण और उसे बचाने पर केन्द्रित है। आज जरूरत हिन्दी पढ़ने, बोलने और भाषा की शुद्धता को बरकरार रखने की है। पहले यह सम्मेलन साहित्य और साहित्यकारों पर केन्द्रित होता था लेकिन उन्होंने महसूस किया कि यदि भाषा बचायी नहीं गई तो साहित्य को कौन पढ़ेगा। उन्होंने कहा कि इस कार्य में भारत की जिम्मेवारी ज्यादा है और वह उसे निभा भी रहा है।
श्रीमती स्वराज ने कहा कि भाषा के साथ संस्कृति का गौरव भी जरूरी है इसलिए इस सम्मेलन का मुख्य विषय ‘हिन्दी विश्व और भारतीय संस्कृति’ रखा गया है। उन्हें खुशी है कि गिरमिटिया देशों में संस्कृति का गौरव कायम है। उन्होंने कहा कि 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन की तैयारियों का जायजा लेने के लिए वह कुछ दिनों पहले जब मॉरीशस आयीं थी तब यहां के प्रधानमंत्री प्रवीण जगन्नाथ ने उन्हें रात्रि भोज पर आमंत्रित किया था। उस भोज में खिचड़ी भी परोसी गयी थी और उस समय श्री जगन्नाथ ने कहा कि उनके यहां हर संक्रांति को खिचड़ी बनती है। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, ‘उनकी मां खिचड़ी बनाना जानती हैं तुम भी खिचड़ी बनाना सीख लो।’ उन्होंने कहा कि श्री जगन्नाथ हिन्दी बोलना नही जानते हैं इसलिए उनमें भाषा को न जान पाने की निराशा और संस्कृति को बचाये रखने की छटपटाहट उन्हें दिखाई देती है।
विदेश मंत्री ने कहा कि समारोह की शुरुआत में केन्द्रीय हिंदी संस्थान आगरा के जिन पांच विद्यार्थियों ने सरस्वती वंदना की वे भारत और मॉरीशस की नहीं बल्कि अन्य देशों की थी, यह हिन्दी के लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1975 में जब पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हुआ था और उस समय से ही दो अनुशंसाएं हर बार होती थी कि विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना हो और संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता मिले। विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना हो चुकी है और अब यह सुचारू रूप से काम भी कर रहा है ।
शिवा उपाध्याय सूरज
वार्ता
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