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त्रिनिदाद के रवि महाराज ने कहा कि भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए उसे स्थानीय संदर्भों एवं जरूरतों के आधार पर प्रचारित-प्रसारित करना चाहिए। ब्रिटेन की शैल अग्रवाल ने प्रवासी संसार में भारतीय संस्कृति एवं अपनेपन की कमी को रेखांकित किया। अमेरिका की मृदुल कीर्ति ने भाषा एवं संस्कृति के बिखरे सूत्रों को स्वस्थ मन:स्थिति में जोड़ने की बात कही।
फिजी के अनिल जोशी ने संस्कृति, भाषा एवं साहित्य में संस्थागत हस्तक्षेप करने की मांग करते हुये कहा कि प्रतिनिधि प्रवासी रचनाकारों की रचनाओं की अलोचना एवं विवेचना के लिए मानक प्रारूप अपनाया जाना चाहिए। विश्व की अन्य भाषाओं की तरह हिंदी सीखने के लिए ऑनलाइन शिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए।
सिंगापुर की संध्या सिंह ने दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदी भाषा के शिक्षण एवं शिक्षकों के प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। इस सत्र में हरजेंद्र चौधरी ने कहा कि हिंदी के जीवित रहने के लिए इसे जीवन की जरूरतों से जोड़ना अति आवश्यक है। गुलशन सुखलाल ने प्रवासी भाषा एवं साहित्य को वर्गीकरण से आगे बढ़कर एक सैद्धांतिकी विकसित किये जाने पर बल दिया। इस सत्र में हिंदी भाषा एवं संस्कृति का एकोफोन, दक्षिण एशियाई एवं ल्यूसोफोन क्षेत्रों तक विस्तार किये जाने की विशेष आवश्यकता पर बल दिया। सत्र में इक्कीस वक्ताओं द्वारा प्रवासी संसार में भाषा एवं संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर मंतव्य रखे गये। सत्र की अध्यक्षता कमल किशोर गोयनका एवं संयोजन नारायण कुमार द्वारा किया गया।
शिवा. उपाध्याय. सूरज
(वार्ता)
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