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प्रोफेसर खेईना ने कहा कि हिंदी के प्रसार में भारत के लोग ही बाधा और चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं। भारत के लोग खुद से सवाल करें कि वे हिंदी को कैसा समझते हैं। यदि उनसे पूछा जाये कि क्या वे हमेशा हिंदी में बात करते हैं तो उनका जवाब होगा नहीं। यही हिंदी के प्रसार की सबसे बड़ी समस्या है। उन्होंने कहा, “हम सब हिंदीप्रेमी चाहते हैं कि हिंदी अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन जाये लेकिन जब भारत के लोग ही इसे राष्ट्रभाषा न मानें तो हम विदेशी क्यों मानें।”
उन्होंने कहा कि हिंदी के साथ सबसे बड़ी समस्या है कि यदि भारत के लोग ही अपनी भाषा बोलने में शर्म महसूस करेंगे तो दूसरे देश के लोग इसे सीखने का कष्ट क्यों उठायेंगे। उन्होंने कहा कि चीन में भी तिब्बती, मंगोलियाई, कुर्द और कोरियाई भाषा सीखते हैं लेकिन पूरे देश की भाषा चीनी ही है। चीन के लोग अपनी भाषा पर गर्व महसूस करते हैं और अंग्रेजी जानते हुये भी अपनी भाषा में बात करते हैं। यही कारण है कि चीन में काम करने वाले विदेशियों को भी चीनी भाषा सीखनी पड़ती है।
श्री खेईना ने कहा कि उनके देश में हिंदी पढ़ने वालों को मंत्रालय, मीडिया, विश्वविद्यालय और चीनी कंपनियों में नौकरी मिल रही है। वहीं, भारतीय कंपनियां हिंदी बोलने वालों को रोजगार नहीं दे रही हैं। यह बड़ी ही अजीब बात है।
शिवा सूरज
जारी (वार्ता)
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