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क्या होगा अगर दो मोर्चो पर जंग छिड़ गई तो?

क्या होगा अगर दो मोर्चो पर जंग छिड़ गई तो?

नयी दिल्ली. 22 जनवरी (वार्ता) ‘‘चीन की तो बात छोड़ दीजिये, अगर जंग की नौबत आई तो भारत पाकिस्तान को भी परास्त नहीं कर पाएगा।’’ अगर ऐसा आत्म पराजय वाला निष्कर्ष को पेश करे तो एक जोरदार बहस देश के सैन्य बलों की क्षमता को लेकर छिड़ जाना लाजिमी है। हाल ही में जब ‘‘ड्रैगन आॅन आॅवर डोरस्टेप’’ पुस्तक आई तो उसने ऐसी ही बहस छेड़ दी। यह पुस्तक ऐसी काल्पनिक स्थिति को सामने रखकर सैन्य बलों का आकलन करती है जिसमें भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों ही ओर से जंग की नौबत का सामना करना पड़ता है। ‘‘अगर भारत को चीन से मैदान में मुकाबला करना पड़ा तो उसे एक बार फिर से पराजय का सामना करना पड़ सकता है’’। यह निष्कर्ष है पुस्तक के लेखक प्रवीण साहनी और गजाला वहाब का, जिनका रक्षा जगत में जाना माना नाम है। उनका कहना है कि इसमें परमाणु हथियारों से कोई लेना देना नहीं है। भारत, चीन और पाकिस्तान की रणनीति में परमाणु और परंपरागत हथियारों की योजना अलग-अलग हैं। सही कारण तो यह है कि पाकिस्तान ने सैन्य ताकत बनाने पर जोर दिया जबकि भारत ने सैन्य बलों के निर्माण पर ध्यान जमाया।


किताब के निष्कर्षों से सहमत हुए बिना भी इसे रक्षा प्रतिष्ठान और सामरिक विशेषज्ञों ने काफी सराहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सकारात्मक बहस की शुरूआत करती है ताकि भारत अपनी सैन्य रणनीति को नए सिरे से परिभाषित कर सके। अमेरिका स्थित कार्नेगी एन्डोवमेंट फार इंटरनेशनल पीस के सीनियर एसोसिएट एश्ले टैलिस ने कहा,‘‘यह इस बात का सपाट विश्लेषण देती है कि भारत किस तरह अपनी राष्ट्रीय ताकत और खास तौर से सैन्य क्षमताओं को लगातार चौधराहट जमाते जा रहे चीन के सामने कैसे प्रोजेक्ट कर सकता है और शांति बनाए रखने में कामयाब हो सकता है। उन्होंने कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से सरोकार रखने वाले सभी लोगों को यह पुस्तक सावधानी से पढ़नी चाहिए। गौरतलब है कि श्री टैलिस का नाम भारत में अमेरिका के अगले राजदूत के रूप में गिनाया जा रहा है। पूर्व सेना प्रमुख वी पी मलिक की राय में चीन और भारत अगले दशकों में एशिया की भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था तय करेंगे और ऐसे में श्री साहनी और गजाला वहाब की यह कृति चीन के साथ संबंधों को शांतिपूर्ण ढंग से संचालित करने की दिशा में एक अनूठा नजरिया देती है।


पुस्तक में पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायण के हवाले से कहा गया है कि चीन के साथ भारत की समस्याएं इतिहास की देन भले ही हों लेकिन उन्हें आने वाले इतिहास पर छोड़ने के बजाए सुलझाने की जरूरत है। यह बात उन्होंने मार्च 2000 में पेईचिंग यात्रा के दौरान उस समय कही थी जब चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति ने कहा कि भारत और चीन के बीच की समस्याएं इतिहास की छोड़ी हुई हैं और उनके बारे में संयम बरतने की जरूरत है। पुस्तक कहती है-‘‘अफसोस की बात यह है कि राजीव गांधी के समय से ही भारत के तमाम प्रधानमंत्रियों ने चीन के साथ सीमा विवाद को देश के प्रमुख सरोकार के रूप में नहीं देखा और न ही उन्होंने इसे भारत के लगातार बढ़ते ओहदे को प्रभावति करने वाली समस्या के तौर समझा। पुस्तक में अनुमान जाहिर किया गया है कि अगर भारत का पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ तो उसमें चीन उसका पूरा सहयोग करेगा। ऐसे में भारत को दो मोर्चों पर जंग की पूरी तैयारी रखनी होगी या फिर शांति बनाए रखने की रणनीति अपनानी होगी। इन दोनो में से कोई भी तैयारी नहीं करना आत्मघाती साबित हो सकता है। कौशिक, उप्रेती देवेन्द्र वार्ता

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