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नीरज की जन्मस्थली पुरावली में साहित्य साधना केंद्र बनाने की गुहार

नीरज की जन्मस्थली पुरावली में साहित्य साधना केंद्र बनाने की गुहार

इटावा, 20 जुलाई (वार्ता) मशहूर गीतकार पद्मभूषण गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ की स्मृतियों को ताजा रखने के लिए लोगों ने उनकी जन्मस्थली इटावा जिले के पुरावली गांव में साहित्य साधना केंद्र बनाने की गुहार उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से लगायी है।


       महेवा ब्लाक के पुरावली गांव में चार जनवरी 1925 को जन्मे नीरज जब मात्र छह साल के थे कि उनके सिर से पिता बृजकिशोर का साया उठ गया था। उसके बाद परिवार इकदिल कस्बे के कायस्थान मोहल्ले में रहने लगा था। नीरज का पालन पोषण उनके फूफा हरदयाल प्रसाद वकील साहब ने एटा में किया था। उनके निधन से पुरावली और इकदिल में शोक व्याप्त है। गांव के लोग चाहते हैं कि पुरावली में देश के जानेमाने कवि का स्मारक और उनकी मूर्ति की स्थापना की जाये। इसके साथ ही साहित्य साधना केन्द्र का निर्माण हो जिससे यहां आने वाले साहित्य प्रेमियों को उनके बारे में समुचित जानकारी हो सके।

       पुरावली के ग्राम प्रधान सुभाष यादव ने कहा कि गांव में नीरज की पुश्तैनी जमीन है जिसकी गांव के लोग मिलजुल कर देखरेख करते हैं। अगर सरकार और जिला प्रशासन चाहे तो उस जगह पर स्मारक बनवा कर मूर्ति स्थापित करवाने के साथ साथ द्वार बनवा सकता है। इसके लिए गांव वाले भी मदद करने के लिए आगे आने को तैयार हैं।

          गांव के महंत मदन मोहन ने कहा “ प्रख्यात कवि का यह मकान था जिस जगह पर मैं बैठा हुआ हूं। यह सब जगह उनकी ही है । उनकी जगह पर ही मंदिर बना हुआ है। जब कभी गोपाल यहॉ आये तो ठाकुर जी के दर्शन करके ही गये।”

साबिर अली बताते हैं “ एक दफा उनका गांव में कार्यक्रम लगा हुआ था लेकिन अचानक गांव में एक शख्स की मौत के बाद उसे रद्द करना पडा तो फिर नीरज जी पूरे गांव में घूमे और उन्होंने अपने घर को सबको दिखाते हुए यादों को ताजा किया। उन्होंने गांव के उस कुएं को भी दिखाया जिससे वो पानी भरा करते थे।”

      वरिष्ठ साहित्यकार एवं एचएमएस इस्लामिया इंटर कालेज के हिंदी विभाग के प्रमुख डा. कुश चतुर्वेदी ने कहा “गोपाल दास नीरज एक नाम भर नहीं है वो हिंदी गीतों के सुकोमल गीतकार भी थे जिसको हम सभी ने खो दिया है। यह हमारे लिए एक दुर्भाग्यशाली दिन है। हरिवंश राय बच्चन के बाद यदि किसी कवि को जो लोकप्रियता मिली हुई है वो सिर्फ गोपाल दास नीरज ही रहे हैं। उनकी शैली और चिंतन किसी भी कवि से अनुकरण नहीं है। नीरज अपने आप में एक शैली थे। देश के दूसरे कवियों को नीरज से उस चिंतन धारा से जुडना चाहिए जिससे समाज को एक संदेश मिलता हुआ दिखाई देता रहा है। ”

       कवि के परिवारिक भाई ज्वाला शरण सक्सेना नीरज की मौत को लेकर बेहद दुखी नजर आते हुए यादों ही यादों को समेटते हुए बताते हैं कि उनको बचपन में पंतग उड़ाने का बहुत शौक था। उनके गांव पुरावली से चंद किलोमीटर की दूरी पर यमुना नदी है। बचपन में ही पिता की मौत के बाद गोपाल अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ इकदिल में जाकर बस गये थे।

       छोटी उम्र में पिता का साया सर से उठ जाने के बाद फूफा के यहां पले बढ़े ‘गोपालदास’ को उनकी यायावरी ने ‘नीरज’ बना दिया। जमींदार पिता से विरासत में मिली जमींदारी बेचकर महज खानपुर स्टेट में नौकरी करने वाले महाकवि गोपालदास नीरज की जिंदगी में देश के कई शहरों ने रंग भरे।

        उन्होंने एटा से ही 1942 में हाईस्कूल की शिक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की और इटावा कचहरी में टाइपिस्ट की नौकरी शुरू की। टाइपिस्ट की नौकरी रास नहीं आयी तो वर्ष 1946 में दिल्ली के आपूर्ति विभाग में 67 रुपये प्रतिमाह की नौकरी करने लगे। यहां भी पसंद नहीं आया, तो कानपुर चले गए और डीएवी कालेज में लिपिक के पद पर नियुक्त हो गए। कानपुर में नीरज की मुलाकात शायर फरहत कानपुरी से हुई और वह कविता की दुनिया में आ गए।

नीरज ने कानपुर में बालकन ब्रदर्स के यहां पांच वर्ष तक स्टेनो की भी नौकरी की। वर्ष 1949 में इंटरमीडिएट, 1951 में बीए और 1953 में एमए की डिग्री भी उन्होंने कानपुर से हासिल की। कुछ दिनों बाद राज्य सरकार ने उन्हें सूचना अधिकारी के पद पर तैनात कर दिया था। यहां पर वह एक साल नहीं रह पाए और मेरठ के एक सरकारी कालेज में प्राध्यापक हो गए। बाद में वे धर्म समाज कालेज अलीगढ़ में प्रोफेसर हो गए। साहित्यिक मंच पर उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा और बुलंदियों को निरंतर छूते रहे। उन्होंने फिल्मों के लिए अनेक गीत लिखे जो काफी लोकप्रिय हुए।

       इकदिल के अपने पैतृक मकान और जमीन को उन्होंने लगभग आठ वर्ष पूर्व बेच दिया था। वे चार भाई कृष्ण दास, गोपाल दास, नारायण दास, दामोदर दास थे। नारायण दास अभी जीवित हैं और अमेरिका में रहते हैं। गोपाल दास नीरज इटावा शहर में बराही टोला व लालपुरा मोहल्ले में भी रहे हैं।

       कवि सम्मेलनों में अपार लोकप्रियता के चलते नीरज को मुम्बई के फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में ‘नई उमर की नई फसल’ के गीत लिखने का निमन्त्रण दिया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पहली ही फ़िल्म में उनके लिखे कुछ गीत जैसे कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे और देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा, बेहद लोकप्रिय हुए जिसका परिणाम यह हुआ कि वे मुम्बई में रहकर फ़िल्मों के लिये गीत लिखने लगे।

       फिल्मों में गीत लेखन का सिलसिला मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी जैसी अनेक चर्चित फिल्मों में कई वर्षों तक जारी रहा लेकिन मुम्बई की ज़िन्दगी से भी उनका जी बहुत जल्द उचट गया और वे फिल्म नगरी को अलविदा कहकर फिर अलीगढ़ वापस लौट आये। नीरज के चंद मशहूर शेर ऐसे हैं जिनको हर बार सुनने के लिए लोग लालायित रहते हुए नजर आते हैं।

इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में।

न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में।।

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