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रूमानी गीतों से दीवाना बनाया था अंजान ने

.. पुण्यतिथि 13 सितम्बर के अवसर पर ..
मुंबई 12 सितम्बर (वार्ता) लगभग तीन दशक से अपने रचित गीतों से हिन्दी फिल्म जगत को सराबोर करने वाले गीतकार अंजान के रूमानी नज्म आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते है ।
अट्ठाइस अक्टूबर 1930 को बनारस मे जन्में अंजान को बचपन के दिनो से हीं उन्हे शेरो शायरी के प्रति गहरा लगाव था। अपने इसी शौक को पूरा करने के लिये वह बनारस मे आयोजित सभी कवि सम्मेलन और मुशायरों के कार्यक्रम में हिस्सा लिया करते थे , हालांकि मुशायरों के कार्यक्रम में भी वह उर्दू का इस्तेमाल कम हीं किया करते थे । जहां हिन्दी फिल्मों में उर्दू का इस्तेमाल एक पैशन की तरह किया जाता था । वही अंजान अपने रचित गीतों मे हिन्दी पर ही ज्यादा जोर दिया करते थे । गीतकार के रूप मे उन्होने अपने कैरियर की शुरूआत वर्ष 1953 में अभिनेता प्रेमनाथ की फिल्म ..गोलकुंडा का कैदी ..से की । इस फिल्म के लिये सबसे पहले उन्होने ..लहर ये डोले कोयल बोले ..और शहीदों अमर है तुम्हारी कहानी गीत लिखा , लेकिन इस फिल्म के जरिये वह कुछ खास पहचान नही बना पाये।
अंजान ने अपना संघर्ष जारी रखा । इस बीच उन्हाेंने कई छोटे बजट फिल्में भी की जिनसे उन्हें कुछ खास फायदा नहीं हुआ । अचानक ही उनकी मुलाकात जी.एस.कोहली से हुयी जिनके संगीत निर्देशन मे उन्होंने फिल्म लंबे हाथ के लिये ..मत पूछ मेरा है मेरा कौन ..गीत लिखा । इस गीत के जरिये वह काफी हद तक पहचान बनाने मे सफल हुए। लगभग दस वर्ष तक मायानगरी मुंबई मे संघर्ष करने के बाद वर्ष 1963 मे पंडित रविशंकर के संगीत से सजी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान पर आधारित फिल्म ..गोदान.. मे उनके रचित गीत ..चली आज गोरी पिया की नगरिया .. की सफलता के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा ।
प्रेम टंडन
जारी वार्ता
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