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हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के गुरु सुबेदार मेजर बाले तिवारी की उपेक्षा क्यों

हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के गुरु सुबेदार मेजर बाले तिवारी की उपेक्षा क्यों

नयी दिल्ली, 28 अगस्त (वार्ता) हाल ही में देश का सर्वोच्च खेल पुरस्कार जिसे अब तक राजीव गांधी खेल रत्न के नाम से जाना जाता था। खेल के क्षेत्र में दिए जाने वाले उस पुरस्कार के नाम को बदलकर प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद के नाम किया, यह कार्य वर्षों पहले हो जाना चाहिए था लेकिन गांधीवादी सोच रखने वाली तत्कालीन सरकारों ने अनदेखी की। इन्हीं कारणों से खेल जगत उपेक्षित और हाशिए पर रहा। यह समाज में निंदनीय है।

मोदी जी ने खेल की भावनात्मक दृष्टि को देखते हुए सराहनीय कदम उठाया। खेल पुरस्कार ध्यानचंद के नाम से किया। लेकिन ध्यानचंद अपने गुरु बाले तिवारी के साहसिक योगदान के कारण ही साहसिक खिलाड़ी बने। उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। गुरु के नाम को जीवंत रखने के लिए वर्तमान सरकारों को कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है। क्योंकि भारत वह देश है जहां आदिकाल से गुरु शिष्य परंपरा रही है। गुरुओं का सम्मान होता रहा है और धर्मशास्त्रों में गुरु को ईश्वर से ऊपर माना गया है। फिर जब भगवान ने धरती पर अवतार लिया तब उन्हें, उनके गुरु ने ही मार्गदर्शन दिया और जीवन का उद्देश्य पूर्ण करने में उनकी नदद की। हम सबके प्रिय और आराध्य मर्यादापुरुषोत्तम भगवान राम ने अपने गुरु महर्षि विश्वामित्र के प्रिय शिष्य रहे। उनके द्वारा दिखाए हुए रास्ते पर चलते हुए उन्होंने संपूर्ण विश्व में अपने देश, गुरु और कुल का नाम रोशन किया है। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः”

गुरु और शिष्य के बीच केवल शाब्दिक ज्ञान का ही आदान प्रदान नहीं होता था बल्कि गुरु अपने शिष्य के संरक्षक के रूप में भी कार्य करता है। तो वहीं दूसरी तरफ गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु-शिष्य परम्परा को ‘परम्पराप्राप्तम योग’ बताया है। गुरु-शिष्य परम्परा का आधार सांसारिक ज्ञान से शुरू होता है, परन्तु इसका चरमोत्कर्ष आध्यात्मिक शाश्वत आनंद की प्राप्ति है, जिसे ईश्वर -प्राप्ति व मोक्ष प्राप्ति भी कहा जाता है। बड़े भाग्य से प्राप्त मानव जीवन का यही अंतिम व सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए। ” गुरु एक मशाल है, शिष्य प्रकाश। ऐसी तमाम मिशालें हमारे देश में मौजूद हैं।

धर्मशास्त्रों में वर्णित गुरु शिष्य परंपरा को आधुनिक युग में भी आगे बढ़ाया सुबेदार मेजर बाले तिवारी और हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद ने। अपने समय में उनकी जोड़ी काफी लोकप्रिय रही। उन्होंने साथ में जितने भी मैच खेले उनके परिणाम सुखद रहे हैं। खेल जगत की इस मशहूर गुरु शिष्य की जोड़ी को लेकर देर से ही सही लेकिन अब कई सामाजिक संगठन आगे आने लगे हैं और सरकार से मांग कर रहे हैं कि डॉ. सर्व पल्ली राधाकृष्णन के नाम पर तो शिक्षक दिवस मनाया जाता है तो सुबेदार मेजर बाले तिवारी भी इस सम्मान के हकदार हैं। उनके भी नाम से सरकार को कुछ करना चाहिए। यह मांग की है सुबेदार मेजर बाले तिवारी के पड़पोते समाजसेवी वरुण तिवारी ने और समाजसेवी शैलेंद्र कुमार ने जो की केशव विश्वविद्यालय पीठ फाउंडेशन के बोर्ड सदस्य हैं एवं अखिल भारतीय संस्कृत प्रकाशक संघ संस्थापक प्रचार मंत्री भी हैं। उन्होंने इसके पहले भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कई सामाजिक मुददों से अवगत कराया जिसका एक और सफल परिणाम हाल ही में उत्तर प्रदेश में माननीय योगी जी के द्वारा देखने को मिला। समाजसेवी ने पीएम को पत्र लिखकर बच्चों को निशुल्क लैपटाप प्रदान करने के लिए कहा था जिसके संदर्भ में माननीय पीएम के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने यह फैसला लिया है। इसके अलावा ऐतिहासिक दिल्ली विश्वविद्यालय सोशल सेंटर को. एजुकेशन स्कूल मोरिस नगर, दिल्ली जिसकी स्थापना राजाराम मोहनराय और ब्रिटिश शासक सर मोरिस द्वारा की गई थी, के कायाकल्प को लेकर हो, कोरोना के समय सरकार द्वारा उचित प्रबंधन को लेकर हो या कुछ और समय-समय पर की लोगों के हित को ध्यान में रखकर मांग की जाती रही है।

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