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‘कोरोना’ के डर ने प्रकृति को दिया संवरने का मौका

‘कोरोना’ के डर ने प्रकृति को दिया संवरने का मौका

लखनऊ 21 अप्रैल (वार्ता) मानव जीवन के इन दिनों दहशत का पर्याय बने नोवल कोरोना वायरस के खतरे से निपटने के लिये पूरी दुनिया एकजुट होकर उपाय खोज रही है वहीं लाकडाउन के इस मौके का फायदा उठाते हुये प्रकृति भी अपने बिगड़े स्वरूप को संवारने में व्यस्त है।

डर के इस अनचाहे माहौल के बीच निर्मल होती नदियां और पवित्र हवा के झोंके मानो संदेश देना चाहते है कि खुद को सभ्य समझने वाले इंसान ने आधुनिकता की होड़ में उसका कितना नुकसान किया है। कोरोना जैसे सूक्ष्म विषाणु का मुकाबला करने के लिये दिन रात एक कर रहा इंसान प्रकृति के इस मिजाज को अब भी नहीं समझा तो अपने विनाश का वह खुद जिम्मेदार होगा।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार लाकडाउन से पहले और बाद की स्थिति पर नजर डालें तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है। पिछली 21 फरवरी को दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 194 था जबकि आज यानी 21 अप्रैल को यह घटकर 80 पर आ गया है वहीं इस अवधि में कोलकाता में एक्यूआई 113 से कम होकर 37, मुबंई में 143 से 53, बंगलूरू में 112 से 31,कानपुर में 152 से 56 और लखनऊ मेें 261 से घटकर 55 पर आ चुका है।

यहां यह जानना जरूरी है कि अनुकुल और अच्छे पर्यावरण के लिये एक्यूआई का पैमाना 0- 50 मापा गया है जबकि 51 - 100 को सन्तोषजनक,101 - 200 को उचित नही पर काम चलाऊ लेकिन फेफड़े ,अस्थमा एवं हृदय रोगियों के नुकसान दायक और 201 - 300 को सभी के लिए नुकसानदेह माना गया है ।

इसी तरह नदियों में बायोलोजिकल आक्सीजन डिमांड (बीओडी) के स्तर मे उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है और गंगा,यमुना,गोमती और सरयू समेत अधिसंख्य नदियों का जल पहली ही नजर में देखने पर स्वच्छ और निर्मल दिख रहा है।

पर्यावरणविदों की माने तो प्रकृति का मिजाज मानव सभ्यता के लिये एक सधा संदेश है। कोरोना का संकट एक न एक दिन टलना तय है लेकिन इस दौरान जल,थल और आकाश में हो रहे बदलाव के माध्यम से प्रकृति जो कहना चाह रही है, उसे भारत समेत पूरी दुनिया को समझना होगा। वायु प्रदूषण के लिये जिम्मेदार पेट्रोलियम चलित वाहनों की संख्या पर लगाम लगानी होगी वहीं नदियों पर अतिक्रमण और विषैले रसायनों के उत्प्रवाह को हर हाल में रोकना होगा।

वर्ष 2015 में प्रकाशित अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की एक रिपोर्ट का जिक्र करना यहां जरूरी होगा जिसमें कहा गया था कि पिछले 20 साल में पृथ्वी पर हरियाली की स्थिति दक्षिण एशिया के दो बड़े देश भारत और चीन की वजह से बेहतर हुई है। दोनो देशों के पास कुल धरती का नौ फीसदी हिस्सा है लेकिन हरियाली के मामले में दोनों देश विश्व की एक तिहाई भाग का प्रतिनिधित्व करते हैं।

बॉस्टन विश्वविद्यालय के लेखक झी चेन ने अपनी पुस्तक नेचर सस्टेनिबिलिटी में लिखा है कि चीन के अधीन पूरी दुनिया की 6.6 प्रतिशत उर्वरक ज़मीन है जिसमें उसने हरियाली के मामले में 25 प्रतिशत बढ़ोतरी हासिल की है। चीन में हरियाली क्षेत्र का 42 प्रतिशत इलाका जंगल का है और 32 प्रतिशत पर खेती होती है वहीं भारत में खेती योग्य जमीन 82 प्रतिशत लेकिन जंगल मात्र 4.4 प्रतिशत है।

इस शोध की सह-लेखिका रामा नीमानी ने लिखा,“जब इंसान को समस्या का पता चलता है तभी वो उसे ठीक करने के लिए कदम उठाता है। 70 और 80 के दशक में चीन और भारत को पता चला को अपने मुश्किल हालात का आभास हुआ जबकि 90 के दशक उन्हें महसूस हो गया और आज स्थिति बेहतर है। शोध के अनुसार, ये रुझान बाद में बदल भी सकते हैं क्योंकि भारत में खेती अभी भी भू-जल के ऊपर आसरित है और अगर उसमें बाद में कमी आती है तो इसका असर आकड़ों पर भी पड़ेगा।

जल संरक्षण के लिये पिछले एक दशक से काम कर रहे जलदूत नंद किशोर वर्मा कहते हैं कि पर्यावरण को अपना सन्तुलन स्थापित करना बहुत अच्छे तरीके से आता है। प्रकृति के सिपाही बाढ़,भूकम्प,सुनामी,सूखा,ओलावृष्टि और महामारी आदि अदृश्य शक्ति के रूप में ही मनुष्य के सामने आतेे रहे हैं और आते रहेंगे।


नीला जहान के संस्थापक ने कहा कि आज पूरी दुनिया जिस महामारी की चपेट में आकर घरों में मुँह छिपाए बैठने को मजबूर है इसके लिए मानव कम जिम्मेदार नहीं है। धरती के साथ किये गए अत्याचार , लूट ,अंधाधुंध दोहन ,घर की नालियों से लेकर समुद्र तक , पाताल से लेकर अंतरिक्ष तक विज्ञान व तकनीकी सहयोग से कूड़े कचरे का अनंत विषैले पहाड़ खड़े कर दिए , सम्पूर्ण धरा को अपनी बपौती समझ असंख्य जीवों के जीवन से खिलवाड़ किया।

ऑस्ट्रेलिया की ताजा घटना में वहां की सरकार ने पानी संकट का जिम्मेदार मानते हुए 10,000 ऊँटो को गोली मारने का आदेश दे दिया जबकि इस धरती पर प्राकृतिक सन्तुलन के लिये सभी जीवों की भागीदारी एकसमान है। दुनिया कोरोना महामारी के भीषण संकट से जूझ रही है। लाखों जाने गयीं ,करोड़ों बीमार हैं,आर्थिक स्थिति डावांडोल है। इसका दूसरा पहलू अगर प्रकृति के चश्मे से देखें तो वह सुखद लगता है। नदियों की स्वच्छता की जो रिपोर्ट विभिन्न स्थानों से आ रही हैं जो हजारों करोड़ रुपये खर्च कर जो नदियां विगत तीन दशकों में साफ नही हो रही थीं वह इस कोरोना लॉक डाउन के लगभग एक महीने में बगैर एक पैसा खर्च किये साफ हो गईं ।

इससे एक बात तो निश्चित रूप से कही जा सकती है कि समाज और सरकार को अपने प्राकृतिक संसाधनों के रख रखाव पर आत्म चिंतन कर कोई सर्वमान्य रास्ता निकालना होगा जिससे धरती के साथ उचित व्यवहार कर आदिकाल तक सुरक्षित रखने में सहायक की भूमिका निभाई जा सके ताकि भविष्य में कोई महासंकट मानवता को नुकसान न पहुँचा सके।

श्री वर्मा के कथन से पहले ही हालांकि उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण एवं संरक्षण प्राधिकरण (ईपीसीए) ने दिल्ली-एनसीआर के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) से लॉकडाउन की अवधि में हुए पर्यावरण सुधार पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने को कह दिया है।

लॉकडाउन के दौरान यह स्पष्ट हो गया है कि निजी वाहनों की संख्या कम करने, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने, औद्योगिक इकाइयों के प्रदूषण समेत विभिन्न स्तरों पर अंकुश लगाने से किस हद तक वायु, ध्वनि और जल प्रदूषण को कम किया जा सकता है। इसलिए भविष्य में इस दिशा में जो भी योजनाएं तैयार होंगी, उनमें लॉकडाउन के अनुभव का भी समावेश रहेगा। यह भी संभव है कि हालात सामान्य होने पर भी अनेक स्तरों पर नियम-कायदों के साथ थोड़ा अंकुश बरकरार रखा जाए।


केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण में सबसे ज्यादा हाथ डीजल वाहनों का है जिसमें वायु प्रदूषण से होने वाली कुल मौतों में दो तिहाई मौतों की वजह डीजल वाहन हैं। यह निष्कर्ष वायु प्रदूषण के कारण वर्ष 2015 में जान गंवाने वाले लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण कर निकाला गया है। इसमें बताया गया है कि वैश्विक स्तर पर वर्ष 2015 में वायु प्रदूषण के कारण तीन लाख 85 हजार लोगों की मौत हुई थी।

एक शोध में कहा गया है कि वैश्विक स्तर आउटडोर वायु प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह वाहनों से निकलने वाला धुआं है। ये वाहन सिर्फ निजी ही नहीं, बल्कि कारोबार के लिए भी प्रयोग किए जाते हैं। दुनियाभर के देशों में एक-दूसरे से व्यापार के लिए चीजों के आयातनिर्यात में भी ये वाहन प्रयोग होते हैं। इस तरह ये एक ओर जहां दुनिया के कारोबार में अहम भूमिका निभाते हैं, वहीं हमारी सेहत पर भी गंभीर असर डालते हैं।

मिजोरम में कार्यरत कृषि वैज्ञानिक ओपी सिंह धरती को पेड़ पौधों से हरा भरा रखने के जुनून के साथ सेव अर्थ बाय प्लांट नामक स्वयं सेवी संस्था का संचालन करते हैं और साल में दो बार विभाग से छुट्टी लेकर अपने गृह जिले सुल्तानपुर और अन्य प्रदेशों का भ्रमण कर लोगों को पर्यावरण काे लेकर जागरूक करते रहते हैं। उन्होने टेलीफोन पर बताया कि वह पिछले 11 साल से एक मुहिम सेव अर्थ बाय प्लांट चला रहे हैं। इस मुहिम में प्रतिवर्ष हम सुल्तानपुर और प्रतापगढ़ में गांव व स्कूल को अंगीकार करते हुए किसानों और छात्रों को पांच पेड़- आंवला, बेल, अमरुद, नींबू व करौंदा का विकल्प देते हैं।

उन्होने बताया कि इनमें से छात्र व किसान अपनी इच्छा से एक या दो पेड़ का चयन करते हैं। इन औषधि पेड़ों की सहायता से हम गांव व विद्यालय के माध्यम से पोषण एवं पर्यावरण की समस्या का निदान कर रहे हैं, पूरा कार्यक्रम सहभागिता के सिद्धांत पर कार्य कर रहा है। इसमें न्यूनतम सहयोग राशि 12 रूपये और एक हजार रूपये सालाना है। 2019 में इस कार्यक्रम के माध्यम से 1925 पेड़ वितरित किए गए। हमें अपनी पृथ्वी को बचाने के लिए प्रकृति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा।

प्रदीप

वार्ता

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