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लोकरूचि-रामलीला अकबर तीन प्रयागराज

श्री कुमार ने बताया कि इन श्रृंगार चौकियों का प्रारम्भ 1916 से माना जाता है। पजावा की श्रृंगार चौकियों में भव्यता,कलात्मकता के साथ सादगी देखने को मिलती है वहीं पथरचट्टी की चौकियों में भव्यता, कलात्मकता के साथ भड़कीलापन अधिक दिखलाई पड़ता है। रामलीला का भी मंचन आधुनिक शैली में होने लगा है राम लीला का मंचन अब लाइट एवम साउंड के माध्यम से नए परिवेश में प्रारम्भ कर गया है|
उन्होंने बताया कि इलाहाबाद की रामलीला और रामदल निकलने की परम्परा सन 1824 से पहले की है, ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है। विशप हैबर ने सन 1824 में “ट्रैवेल्स आफ विशप हैदर” में यहां की रामलीला और रामदल के बारे में विस्तार से लिखा है। दूसरा वर्णन सन 1829 का है जब अंग्रेज महिला फैनी वार्क्स ने अपनी इलाहाबाद यात्रा के दौरान चैथम लाइन में सिपाहियों द्वारा मंचित रामलीला और रावण-वध देखा था। 1829 की किला परेड रामलीला का भी वर्णन इन दस्तावेजों में है। “प्रयाग प्रदीप” पुस्तक में इलाहाबाद के दशहरे मेले के अत्यन्त प्राचीन होने का वर्णन है।
वरिष्ठ रंगकर्मी ने बताया कि पूरे देश में रामलीला का मंचन और रावण का पुतला दहन होता है वहीं यहाँ अलग-अलग जगहों पर रोशनी से सराबोर भगवान की कलात्मक चौकियों का चलन है। चतुर्थी से लेकर दशमी तक मनमोहक रामदल शहर के लोगों और आगंतुकों को जकडे रहता एवं शहर में गंगा-जमुनी तहजीब का एक अनूठा संगम भी देखने को मिलता है। मनमोहक सुन्दर एवं कलात्मक झाकियां इलाहाबाद के मानस पटल पर वर्ष भर के लिए एक गहरी छाप छोड़ जाती हैं।
दिनेश प्रदीप
जारी वार्ता
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