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लोकरूचि कोरोना छप्पन भोग दो अंतिम मथुरा

इस संबंध में पुष्टिमार्गीय मदनमोहन मन्दिर एवं मथुराधीश मन्दिर के मुखिया ब्रजेश ने बताया कि पौराणिक घटना के अनुसार द्वापर में इन्द्र ने ब्रजवासियों द्वारा अपनी पूजा बन्द कर देने के कारण जब संवर्तक मेघों से व्रज को डुबोने का आदेश दिया था। उस समय कान्हा ने गोवर्धन पर्वत उठाकर न केवल ब्रजवासियों की रक्षा की थी बल्कि इसके माध्यम से सामाजिक एकता के महत्व का संदेश देने के लिए न केवल गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर सात दिन और सात रात लगातार धारण किया था बल्कि सामाजिक एकता की शक्ति का संदेश देने के लिए उन्होंने ब्रजवासियों से भी अपनी अपनी लाठी पर्वत के नीचे लगाने को कहा था।
जब इन्द्र अपने कार्य में असफल हो गया और उसने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा याचना की थी तो उसके बाद कान्हा ने ब्रजवासियों से गिर्राज का विशेष पूजन अर्पण करने को कहा था। उन्होंने बताया कि उस समय पूजन के बाद ब्रजवासी अपने अपने घरों से नाना प्रकार के व्यंजन बनाकर लाए थे और उन्हें गिर्राज जी को अर्पण किया था। चूंकि उस समय व्यंजनों की संख्या 56 हो गई थी इसलिए वास्तव में तभी से छप्पन भोग की शुरूवात हो गई थी।
गिरिराज सेवा समिति द्वारा आयोजित छप्पन भोग को देखकर ही अनुभव किया जा सकता है कि यह आयोजन कितना अनूठा होता है। हकीकत तो यह है कि गिरिराज सेवा समिति का छप्पन भोग अपनी अलग ही पहचान बना चुका है। उम्मीद की जाती है कि समिति के सदस्यों ने जिस श्रद्धा और निष्ठा से इस बार यह आयोजन सूक्ष्म रूप में किया, गिर्राज जी कोरोनावायरस के संक्रमण को भारत से दूर करने की उनकी प्रार्थना को सुनेंगे और अगले साल का छप्पन भोग एक नये कलेवर के साथ जनता के सामने होगा तथा एक बार फिर से तीन दिन तक गिर्राज तलहटी का कोना कोना कृष्णमय हो जाएगा।
सं प्रदीप
वार्ता
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