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निजीकरण से नहीं सुधरेगी बिजली विभाग की दशा : वर्मा

लखनऊ 05 जनवरी (वार्ता) उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद का मानना है कि 90 हजार करोड़ रूपये के भारी भरकम घाटे से उबरने के लिये निजीकरण का प्रयास भ्रष्टाचार को बढ़ावा देगा।
परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने मंगलवार को कहा कि 60 साल पहले गठित बिजली विभाग का घाटा 90 हजार करोड़ पहुंच चुका है जिसका मुख्य कारण बिजली कम्पनियो में प्रमुख पदों से लेकर नीचे तक बैठे अभियंताओ की जबाब देही का तय न होना है। बिजली विभाग के निजीकरण से सुधार की कल्पना बेमानी है जब तक प्रमुख सचिव ऊर्जा, चेयरमैन,प्रबंध निदेशक और निदेशकों के कार्यो समेत अभियंताओ की जबाबदेही के साथ परिणाम न मिलने पर उनके खिलाफ सरकार कठोर कदम नहीं उठाती है।
उन्होने कहा कि बिजली विभाग के अनेको मामलो पर आज तक कोई भी दोषियों पर कार्यवाही न होना बड़ा सवाल है। वर्ष 1959 में गठित राज्य विद्युत परिषद् यानि बिजली विभाग को बने आज लगभग 60 वर्ष होने को है जिसमे वर्ष 2020 से विभाग की बागडोर पूरी तरह नौकरशाहों के हाथ में रही और विभाग की आर्थिक स्थित क्या है, किसी से छुपा नहीं है। आज बिजली कम्पनियां लगभग 90 हजार करोड़ के घाटे में है, ऊपर से प्रदेश के विद्युत उपभोक्ताओ का भी लगभग 19 हजार करोड़ बिजली कम्पनियो पर निकल रहा है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि प्रबंधन के खिलाफ कभी भी सरकार की तरफ से कठोर कार्यवाही नहीं की गयी।
इस विभाग में भ्रष्टाचार पर कभी भी अभियान नहीं चला। जब तक सरकार प्रबंधन से लेकर नीचे तक जबाबदेही और कठोर कार्यवाही नहीं करती,उपभोक्ताओ को सही मायने में कोई व्यापक लाभ मिलना मुश्किल है। प्रबंधन को केवल यही लगता है की यदि बिजली कम्पनिया पटरी पर नहीं आ रही तो उसका निजीकरण कर दिया जाये अथवा बिजली दरों में बढ़ोतरी करा दी जाय जो सोच बिलकुल गलत है। प्रबंधन की सबसे बड़ी भूल है निजीकरण का दूसरा मतलब एक मुश्त भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना है।
उपभोक्ता परिषद् सरकार से मांग करती है की पावर कार्पोरेशन बिजली कम्पनियो के चेयरमैन प्रबंध निदेशक निदेशक व सभी फीलड में तैनात बिजली अभियंताओ की जबाब देही और उनके काम का पूरा विवरण वेबसाइट पर डलवाया जाये। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और बिजली कम्पनियां स्वत: आत्मनिर्भर होगी ।
प्रदीप
वार्ता
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